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बाहुबली : अमर चित्रकथा बनी प्रेरणा 


संजय तिवारी 


बाहुबली तेलुगू और तमिल भाषाओं में बनी एक भारतीय फ़िल्म है। यह हिन्दी, मलयालम व कुछ विदेशी भाषाओं में भी बनी है तथा इसे 10 जुलाई 2015 को सिनेमाघरों में दिखाया गया। इसे एस॰एस॰ राजामौली ने निर्देशित किया है। प्रभास, राणा डग्गुबती, अनुष्का शेट्टी और तमन्ना ने मुख्य किरदार निभाए हैं। इसमे रम्या कृष्णन, सत्यराज, नासर, आदिवि सेश, तनिकेल्ल भरनी और सुदीप ने भी कार्य किया है। फ़िल्म की कुछ खास बातों में से एक रही इस फिल्म में चित्रित कालकेय कबीले द्वारा बोली जाने वाली किलिकिलि नामक एक कृत्रिम भाषा जिसका निर्माण मधन कर्की ने लगभग 750 शब्दों और 40 व्याकरण के नियमों द्वारा किया। भारतीय फ़िल्म के इतिहास में यह पहली बार हुआ है, जब किसी फ़िल्म के लिए एक नई भाषा का निर्माण किया गया हो।

किलिकिलि नाम की नयी भाषा मिली 

किसी भी भारतीय फिल्म के लिए ये पहला मौका है जब उसके लिए कोई नई भाषा रची गई है। एसएस राजामौली की ब्लॉकबस्टर 'बाहुबली’ में ऐसा किया गया है। तीन दिन में करीब 160 करोड़ की वैश्विक कमाई कर चुकी इस फिल्म में कालकेय कबीले द्वारा बोली जाने वाली भाषा किलिकिलि बनाई गई। इस भाषा में कथित तौर पर 750 शब्द और 40 व्याकरण के नियम हैं। इससे पहले ऐसा सिर्फ हॉलीवुड फिल्मों में ही किया गया है। जेम्स कैमरॉन ने 'अवतार’ और 'द लॉर्ड ऑफ द रिंग्स’ सीरीज में भी ऐसी भाषाएं रची जा चुकी हैं जिनकी बाकायदा डिक्शनरी हैं, जिनमें व्याकरण के नियम हैं।

माहिष्मती साम्राज्य 

भारत के प्राचीन साम्राज्यों में से एक माहिष्मति, की रानी शिवागामी (रमैया कृष्णन), एक विशाल जलप्रपात के निकट की मांद से एक शिशु को गोद लिए बाहर आती है। वह बड़ी निडरता से अपने पीछा करते सिपाहियों को मार डालती है और शिशु की रक्षा खातिर स्वयं के प्राण बलिदान देती है। ऐन समय पर, स्थानीय ग्रामीण पानी में डूबी रानी की ऊपर उठी बांह में शिशु को देख लेते हैं और उस बच्चे को सुरक्षित बचा लेते हैं।

इस तरह रानी पर्वत की ऊँचाई से गिरते जलप्रपात में डूब कर विलीन होती है। सांगा (रोहिणी) एवं उसके पति उस शिशु का नाम शिवा रखते हैं और अपने बालक समान ही परवरिश करते हैं। गुजरते समय के साथ शिवा (प्रभास) एक बलवान युवक के रूप में बड़ा होता है जिसकी आकांक्षा पर्वत चढ़ने की रहती है और कई बार की वह नाकाम प्रयत्न करता है। एक रोज उसे जलप्रपात में बहते हुए किसी युवती का मुखौटा मिलता है। उस युवती की पहचान ढूंढने की चाह में, वह पुनः पर्वत चढ़ाई का प्रयास करता है और आखिरकार वह सफल भी होता है।

जलप्रपात के शिखर पर, शिवा उस मुखौटे की मालिक अवनतिका (तमन्ना) को खोज निकालता है, एक विद्रोही योद्धा जिसका दल गुरिल्ला पद्धति के जरिए माहिष्मति साम्राज्य के राजा भल्लाल देव/पल्लवाथेवान (राणा दग्गुबती) के विरुद्ध युद्ध लड़ रहा है। दल का लक्ष्य है कि वे पूर्व महारानी देवसेना (अनुष्का शेट्टी) को छुड़ाए जिन्हें राजमहल में गत २५ वर्षों से ज़जीरों में जकड़ रखा है। और यह महत्वपूर्ण जिम्मेवारी अवनतिका को सौंपा गया है। अवनतिका को शिवा की यह बात सुन प्रेम होता है कि वह इस जलप्रपात की तमाम मुश्किलों पर चढ़ाई करता हुआ सिर्फ उसके लिए आया है। शिवा अब इस अभियान को अपने जिम्मे लेने वचन देता है और छिपते-छुपाते हुए माहिष्मति में प्रवेश कर देवसेना को कैद से मुक्त कराता है। शिवा उसे छुड़ा लाता है और साथ लेकर भाग निकलता है मगर जल्द ही राजा का शाही गुलाम कट्टप्पा (सत्यराज), जिन्हें बेहतरीन युद्धकौशल के लिए जाना जाता है, उसके पीछे पड़ता है। मगर घात लगाए भद्रा (अदिवि शेष), भल्लाल देव का पुत्र, अचानक ही शिवा के सर पर वार करता है, मगर कटप्पा अपने शस्त्र गिरा देता है जब उसे मालूम होता है कि शिवा असल में माहेन्द्र बाहुबली है, दिवंगत राजा अमरेंद्र बाहुबली का पुत्र।

फिर यहां भूतकाल में हुए राजा अमरेंद्र बाहुबली की विगत घटनाओं का उल्लेख होता है। अमरेंद्र की माता की मृत्यु उसके जन्म पश्चात होता है, जबकि पिता उससे काफी पूर्व ही गुजर चुके होते हैं। शिवागामी अपने अंगरक्षक कटप्पा के सहयोग से नए राजा चुने तक साम्राज्य के शासन की बागडोर संभालती है। वह अमरेंद्र बाहुबली तथा भल्लाल देव को समान रूप से परवरिश देती है, उन्हें कला, विज्ञान, छल-विद्या, राजनीति और युद्ध कला जैसे कई विद्याओं एवं प्रशिक्षण में पारंगत किया जाता है, मगर दोनों में ही साम्राज्य के शासन की अभिलाषा भिन्न रहती है। जहाँ अमरेंद्र बाहुबली का लोगों के प्रति उदारवादी व्यवहार करते है तो भल्लाल देव बेहद कठोर हैं और अपने लक्ष्य प्राप्ति के लिए हर संभव निष्ठुरता बरतता है, यहां तक कि वह बाहुबली की हत्या भी करा देते है।

जब माहिष्मति को शत्रु कालाकेयास द्वारा युद्ध की चुनौती मिलती है, शिवागामी वचन देती है कि जो कोई भी कालाकेयास के राजा का सिर काटकर लाएगा उसे नया राजा बना दिया जाएगा और इस तरह दोनों नातिनों के बीच बराबरी से युद्ध साधनों का बंटवारे का आदेश दिया जाता है। लेकिन भल्लाल देव के अपाहिज पिता, बिज्जाला देव (नस्सर), छल-प्रपंच द्वारा भल्लाल को अधिक से अधिक युद्ध साधन मुहैया कराता है। युद्ध में जब माहिष्मति एक दफा असफल होकर अपना अंत समझ लेती है, अमरेंद्र अपने सैनिकों को उसके साथ मृत्यु से ही लड़ने को पुनः प्रेरित करता है और शत्रुओं को कुचलकर युद्ध समाप्त करता है। मगर भल्लाल देव पहले ही कालाकेया के राजा का वध कर देता है, शिवागामी बतौर नये शासक के रूप में अमरेंद्र बाहुबली का चयन उसके युद्ध में श्रेष्ठता और नेतृत्वता के फैसले पर घोषणा करती है तो भल्लाल देव को उसके साहस और पराक्रम के लिए सेनानायक बनाती है।

इस पूर्व घटनाओं के बाद, जब राजा अमरेंद्र के बारे में प्रश्न किया गया, तो भावुक कटप्पा राजा के देहांत होने की बात कहता है, और कटप्पा स्वयं को ही उनकी मृत्यु का जिम्मेदार बताता है।


फिल्म के निर्माता राजामौली बताते हैं - मैं तब 7 वर्ष का रहा था जब भारत में प्राकशित अमर चित्र कथा पढ़ा करता था। इनमें किसी महानायक या सुपरहीरो के विषय नहीं होता था, लेकिन भारत से जुड़ी लोककथाओं, दंतकथाओं और ऐसे ही कई कहानियों का इसमें चित्रण किया जाता था। पर उनमें से अधिकतर कहानियाँ भारतीय इतिहास को रेखांकित करती थी। मैं महज उन राजमहलों, युद्धों, राजाओं-महाराजाओं की कहानियों को पढ़ता ही नहीं था बल्कि उन्हीं कहानियों को अपने तरीके से मेरे दोस्तों को सुनाया करता था।

 मुख्य कलाकार 

प्रभास - शिवडु उर्फ माहेन्द्र बाहुबली एवं अमरेंद्र बाहुबली की भूमिका में
राणा डग्गुबती - भल्लाल देव/पल्लवाथेवान
अनुष्का शेट्टी - महारानी देवसेना
तमन्ना - अवनतिका, एक विद्रोही योद्धा और शिवा की प्रेयसी
रमैया कृष्णन - शिवागामी, शिवा की पालक माता
सत्यराज - कट्टप्पा, राज अंगरक्षक
नास्सर - बिज्जालादेव, भल्लाल देव के अपाहिज पिता
रोहिणी - सांगा
तन्नीकेला बहारणी - स्वामीजी
अदिवि शेष - भद्रा, भल्लाल देव का पुत्र
प्रभाकर - राजा कालाकेया
सुदीप (अतिथि भूमिका) - असलम ख़ान
एस. एस. राजामौली (अतिथि भूमिका) - क्रेता
नोरा फ़तेही (अतिथि भूमिका) - नृतक, हरे रंग के परिधान में।
स्कार्लेट मेलिश विल्सन (अतिथि भूमिका) - केसर रंग के परिधान में।
स्नेहा उपाध्याय (अतिथि भूमिका) - नीले रंग के परिधान में।
राकेश वैर्रे -भल्लाल देव का मित्र
तेजा काकुमनु - साकेथुडु
भरानी -मर्थण्डा
सुब्बार्या शर्मा
अदात्या - राज गुरू

निर्माण

प्रभास, राणा और अनुष्का ने इस फिल्म के लिए घर में भी काम किया और कड़ी मेहनत से प्रभास और राणा ने घुड़सवारी सीखी और तलवार से लड़ने का भी अभ्यास किया। इस कारण यह फिल्म के निर्माण और प्रदर्शन में अधिक समय लगा और यह फिल्म जुलाई २०१५ में प्रदर्शित हो सकी।। तमिल संस्करण के संवाद लिखने के लिए तमिल गीतकार मदन कर्की को चुना गया था। उन्होंने पुराने महाकाव्यों व ऐतिहासिक फिल्मों की तर्ज पर इस फिल्म के संवादों को लिखा है। फिल्म में लड़ाई के दृश्यों के प्रत्येक दृश्य को ध्यान से बनाया गया था और यह इस फिल्म के मुख्य आकर्षण हैं। एक विशेष दृश्य के लिए, पीटर हेन ने 2000 लोगो और हाथियों को आसपास दिखाया है। के.के. सेंथिल कुमार को फिल्म का छायांकन करने के लिए चुना गया था। एस॰एस॰ राजामौली ने इस फिल्म में कालकेय कबीले द्वारा बोली जाने वाली किलिकिलि नामक एक भाषा बनवाई। भारतीय फ़िल्म के इतिहास में यह पहली बार हुआ है, जब किसी ने सिर्फ फ़िल्म में इस्तेमाल के लिए एक नई भाषा का निर्माण किया हो। इसमें कथित तौर पर 750 शब्द और 40 व्याकरण के नियम हैं।

पात्र चुनाव

अनुष्का शेट्टी जो पहले भी मिर्ची (2013) में काम कर चुकीं हैं को राजमौली ने पुनः इस फिल्म के लिए चुन लिया। इस फिल्म से जुडने के कारण अनुष्का के 2013 और 2014 का पूरा समय पूरी तरह से व्यस्त हो गया।.इससे वे किसी अन्य फिल्म में काम नहीं कर पाई। राणा दग्गुबती को एक मुख्य नकारात्मक किरदार के रूप में चुना गया, जो संयोग से रुध्रमादेवी में भी कार्य कर चुके हैं। इसके बाद सत्यराज जो तमिल फिल्मों में कार्य करते हैं, उन्हें लिया गया। एक अफवाह के अनुसार श्री देवी और सुष्मिता सेन को इस फिल्म में प्रभास की माँ के रूप में लिया जाने वाला था। लेकिन राजमौली ने इस बात का खण्डन किया। इसके बाद मई 2013 में राजमौली ने सोनाक्षी सिन्हा को अनुष्का शेट्टी के स्थान पर हिन्दी संस्करण के लिए रखने से मना कर दिया। एक समाचार के अनुसार श्रुति हासन भी इस फिल्म में मुख्य किरदार निभाने वाली थीं। लेकिन राजमौली ने इस बात को भी एक अफवाह कहा और कहा की मैंने उनसे किसी भी किरदार के लिए नहीं पूछा था।
कन्नड़ भाषा के एक अभिनेता सुदीप को एक छोटे लेकिन महत्वपूर्ण किरदार के लिए चुना गया। लेकिन जुलाई 2013 में चार दिन के इस काम में उनके और सत्यराज के मध्य विवाद और लड़ाई हो गई। इसके बाद पीटर हिन के साथ भी लड़ाई हो गई। अप्रैल 2013 में अदिवि शेष को उनके पंजा (2011) फिल्म में एक महत्वपूर्ण किरदार के लिए लिया गया। इसके बाद रम्या कृष्णन को अगस्त 2013 में राजमाता के किरदार के लिए लिया गया। इसके बाद नस्सर को एक सहायक किरदार के लिए लिया गया। 11 दिसम्बर 2013 को चरणदीप एक नकारात्मक किरदार के लिए चुने गए। उसके बाद 20 दिसम्बर 2013 में तमन्ना को दूसरे महत्वपूर्ण किरदार के लिए लिया गया। इसके बाद राजमौली ने पवन कल्याण, एन टी रामा राव और सुनील के इस फिल्म में कार्य करने की खबर को एक आधारहीन अफवाह कहा।

फिल्मांकन

करनूल में इसकी शुरुआत हुई।

फिल्म को करनूल में 6 जुलाई 2013 से फिल्माया जाना शुरू हुआ। यह राजमौली की एक और फ़िल्म, एगा (2012) के लगभग एक वर्ष के पश्चात बननी शुरू हुई। यहाँ इसे अगस्त 2013 तक पूरा किया गया। इसके बाद बाकी के हिस्से हैदराबाद में रामोजी फिल्म सिटी में बने। 29 अगस्त तक का कार्य पूरा हो गया और 17 अक्टूबर को अगले हिस्से को बनाना शुरू किया गया, जो अक्टूबर के अंत तक समाप्त हो गया। लेकिन उसके लिए जो स्थान और सेट बनाया गया था वह बारिश के कारण नष्ट हो गया। उस जगह पर लगभग एक सप्ताह का काम था। इसके बाद प्रभास और राणा ने एक और जगह तलाश की। इसके लिए राजमौली ने सभी से इस बारे में बात की। इस घटना को भी फिल्म के अंत में जोड़ा गया। इसके बाद वह लोग केरल में अगले हिस्से के निर्माण के लिए चले गए। जो 14 नवम्बर 2013 में शुरू हुआ।

केरल के थ्रिसूर जिले का अथिरप्पली जलप्रपात

नवम्बर 2013 के अंत तक फिल्म का बाहर में होने वाला हिस्सा बारिश के कारण नहीं फिल्माया जा सका था। इसके लिए केरल में इसका निर्माण शुरू हुआ। यह 4 दिसम्बर 2013 तक समाप्त हुआ। इसमें केरल के प्रसिद्ध जलप्रपात अथिरप्पिल्ली को भी दिखाया गया है। रमौजी ने मीडिया को बताया की इस फिल्म का सबसे बड़ा हिस्सा हैदराबाद में बना है। इस फिल्म में शहर के लगभग 2000 छोटे कलाकार शामिल हुए थे जिन्होंने 23 दिसम्बर 2013 में एक मैदान में काम किया। इसके लिए वह सभी अक्टूबर 2013 से तैयारी कर रहे थे। एक सूचना में पता चला की अनाजपुर गाँव के किसान इस फिल्म को बनने से रोक रहे हैं। वह कह रहे हैं की इस फिल्म को बनाने के लिए अनिवार्य आज्ञा नहीं ली गई है। इस बात को राजमौली ने नहीं माना। नए वर्ष के समय इस फिल्म के निर्माण को 2 दिनों के लिए रोक दिया गया। इसे 3 जनवरी 2014 से शुरू किया गया। मकर संक्रांति के दौरान इस फिल्म में पुनः रुकावट आई और फिल्मांकन पुनः 16 जनवरी 2014 से शुरू हो सका। इस फिल्म ने 18 जनवरी 2014 को अपने फिल्म के निर्माण के 100 दिन पूरे किए।

रामोजी फिल्म सिटी, जहाँ फ़िल्म का मुख्य हिस्सा बना 

28 मार्च 2014 से रात के समय सारे भाग रामोजी फिल्म सिटी में ही बनाए गए। 5 अप्रैल 2014 को राजमौली ने बताया की लड़ाई का आखिरी हिस्सा का ही निर्माण बचा हुआ है। इसके लिए एक नई तिथि तय हुई। कुछ समय के आराम के पश्चात 20 अप्रैल 2014 को पुनः कार्य शुरू हुआ। पहले भाग के दल को मई 2014 के रमोजी फ़िल्म सिटी में कार्य के पश्चात उन्हें कुछ समय के लिए आराम करने छुट्टी दी गई। उसके पश्चात राणा भी आराम के लिए छुट्टी में चले गए। इसके पश्चात ही तमन्ना जून 2014 से दिसम्बर 2014 तक दल से जुड़ गई। साथ ही सुदीप भी 7 जून 2014 को वापस दल में शामिल हो गए। उनके साथ सत्यराज भी शामिल हो गए। वह सभी गोलकोण्डा किले से एक नए हिस्से के निर्माण में लग गए। यह हिस्सा 10 जून 2014 को समाप्त हुआ। राजमौली ने इसके कुछ हिस्सों को पुनः बनाते हैं, जो पिछले वर्ष भारी वर्षा के कारण रुक गया था। 23 जून 2014 को हैदराबाद में दल के साथ तमन्ना भी शामिल हो गई। इस फ़िल्म का निर्माण हैदराबाद के अन्नपूर्णा स्टूडियो में शुरू हुआ। जिसमें प्रभास, तमन्ना, अनुष्का और राणा ने काम किया। यहाँ फ़िल्म के कुछ महत्वपूर्ण भाग बनाए गए। इसे बनाने में 4 दिन का समय लग गया। इसी दौरान यह दल बुल्गारिया तक यात्रा करता है। यहाँ उस भाग का निर्माण किया गया, जो अक्टूबर 2013 में भारी बारिश के कारण तबाह हो गया था।

महाबलेश्वर, जहाँ धुंध, बारिश और ठण्ड के मौसम में इस फ़िल्म के कुछ भाग बनाए गए।

एक गीत के निर्माण में प्रभास और तमन्ना दोनों रामोजी फ़िल्म सिटी में जुलाई 2014 के तीसरे सप्ताह में के शिवशंकर के द्वारा नृत्य सीखते हैं। यह नृत्य रस्सी आदि के सहारे किए गए, जो सामान्यतः किसी लड़ाई के दौरान उपयोग होते हैं। इसके गाने में के के सेंथिल कुमार द्वारा कई लड़ाई के कई हिस्से लिए गए। इसके अलावा इसमें कई उन्नत प्रभाव भी डाले गए हैं। इसके पूर्ण होने के पश्चात इसका अगला भाग रामोजी फ़िल्म सिटी में पीटर हेन के देख रेख में बनाए गए। 10 अगस्त 2014 में यह बताया गया कि यह पहली तेलुगू फ़िल्म है, जिसे बनाने में 200 दिन लगे। इसके पश्चात एक नया भाग महाबलेश्वर में बनाने का निर्णय लिया गया। यह कार्य 26 अगस्त 2014 को शुरू हुआ। सभी कलाकार और दल इस जगह के बेकार मौसम में भी जिसमें धुंध, बारिश और ठण्ड भी शामिल है। इस हिस्से को पूर्ण कर लिया। इसके पश्चात दल अगले हिस्से के लिए रामोजी फ़िल्म सिटी लौट गया। जहाँ 12 सितम्बर 2014 से निर्माण शुरू हुआ। साबू क्यरिल ने 100 फीट का एक मूर्ति का निर्माण किया।. तेलुगू फ़िल्म संस्थान के कार्यकर्ताओं द्वारा हड़ताल के कारण इसके निर्माण में और समय लग गया।

इसके कुछ हिस्से रमोजी फिल्म सिटी में 30 नवम्बर तक प्रभास और राणा के साथ बनाए गए। इसके निर्माण के दौरान तमन्ना को एक कृत्रिम पेड़ पर दिखाया गया। जिसे साबू क्यरिल ने बनाया था। इसमें इस बात को ध्यान में रखा गया था, की तेज हवा में वह कहीं दूर न उड़ जाए। दिसम्बर 2014 में उन्हें 25वें दिन हैदराबाद से बुल्गारिया में स्थानांतरित करना पड़ा। क्योंकि तेलुगू फिल्म के कर्मचारियों ने हड़ताल कर रखा था। वह तीन सप्ताह बाद 23 दिसम्बर 2014 को वापस हैदराबाद लौट आए। इसके बाद निर्माण कार्य चलता गया। इसके बाद निर्माण के लिए राजस्थान से हजारों घोड़ों को खरीदा गया। इसके बाद मार्च 2015 में मनोहरी नामक एक गाना फिल्माया गया।

संगीत

बाहुबली के गाने हिन्दी, तेलुगू और तमिल तीनों भाषाओं में बने हैं। हिन्दी में गानों के बोलों को मनोज मुंतशिर ने और तमिल के सभी गानों के बोल को मधन कर्की ने लिखा है। वहीं इस फ़िल्म में संगीत इसके निर्देशक राजामौलि के भतीजे एम॰ एम॰ कीरवानी ने दिया है।

प्रदर्शन

इस फिल्म का प्रदर्शन 10 जुलाई 2015 को 4 हज़ार से अधिक सिनेमाघरों में किया गया। तेलुगू और हिन्दी के ट्रेलर को 10 लाख से अधिक लोगों ने देखा। इस ट्रेलर को 24 घंटों में फ़ेसबुक पर 1.50 लाख लोगों ने देखा और 3 लाख ने पसंद किया व 2 लाख लोगों ने इसे साझा किया। लेकिन इसे केरल के कुछ ही सिनेमाघरों में दिखाया गया था।

प्रचार

इसके प्रचार के लिए निर्माण के कुछ छोटे दृश्यों को भी प्रदर्शित किया गया था। यह सभी दृश्य अर्का मीडिया वर्क्स के आधिकारिक यूट्यूब खाते में डाले गए थे। इसका प्रचार मुख्य रूप से हैदराबाद में किया गया। इसके लिए एक प्रतियोगिता का आयोजन भी किया गया था जिसमें जीतने वाले को फिल्म के निर्माण स्थल में जाने का मौका मिलता। फिल्म के निर्माण की जानकारी व्हाट्सएप पर लगातार उपलब्ध कराई जा रही थी। इसके प्रचार में इस बात से भी काफ़ी मदद मिली कि यह बीबीसी की एक डाक्यूमेंट्री (भारतीय सिनेमा के 100 वर्ष) में भी उद्धृत हुई जिसका निर्देशन संजीव भास्कर द्वारा किया गया है।

समालोचना

इसके प्रदर्शन के पश्चात इसे इसके दृश्य प्रभाव, कथन और पृष्ठभूमि के लिए कई सकारात्मक समीक्षा मिल चुकी है। दैनिक भास्कर ने इसे 5 में से 3.5 सितारे ही दिये। इसने राजमौली के निर्देशन की प्रशंसा की और इसके गानों में 2-3 को छोड़ कर सभी गानों को अच्छा और दर्शकों को आकर्षित करने वाला बताया। हरिभूमि ने भी निर्देशन की प्रशंसा की। इसके साथ-साथ प्रभास और राणा दग्गुबती के अभिनय और किरदार की भी प्रशंसा की। 

कमाई

बाहुबली ने पहले ही दिन देश विदेश मे 60-70 करोड़ कमाने वाली भारत की पहली फिल्म का दर्जा प्राप्त किया। बाहुबली ने पहले सप्ताह के अंत तक में 250 करोड़ (US$36.5 मिलियन) की कमाई की। यह चौथी सबसे बड़ी फिल्म है, जिसने तीन दिन में ही 162 करोड़ की कमाई की है। इस फिल्म ने विदेशों में पहले ही दिन 20 करोड़ (US$2.92 मिलियन) की कमाई की। अमेरिका और कनाडा में इसने 1.2 मिलियन डालर (7.2 करोड़ रुपये) की कमाई की। फ़िल्म के हिन्दी संस्करण ने पहले दिन 4.25 करोड़ (US$6,20,500) की कमाई की जो किसी भी डब हिन्दी फ़िल्म के लिये दूसरी सबसे बड़ी कमाई के रूप में दर्ज़ हो गयी। इस तरह बाहुबली देश विदेश में 9 दिन मे 303 करोड़ की कमाई करने वाली पहली दक्षिण भारतीय फिल्म गयी। हिन्दी संस्करण कि कुल कमाई पहले सप्ताह में 19.50 करोड़ (US$2.85 मिलियन) पहुँच गई।


निर्देशकएस॰एस॰ राजामौली
निर्माताके राघवेंद्र राव
शोबू यर्लागद्दा
प्रसाद देवीनेनी
पटकथाशंकर,
राहुल कोडा,
मधन कर्की,
विजयेन्द्र प्रसाद
कहानीवी॰ विजयेन्द्र कुमार
अभिनेतानीचे देखें
छायाकारके॰के॰ सेंथिल कुमार
वितरकअर्का मीडिया वर्क्स


प्रदर्शन तिथि(याँ)

10 जुलाई 2015

समय सीमा

159 मिनट

158 मिनट (तेलुगू)
159 मिनट (तमिल)

देशभारत
भाषातेलुगू
तमिल
हिन्दी (डब्बिंग)
मलयालम (डब्बिंग)
लागत₹ 120करोड़
कुल कारोबार

₹ 504 करोड़ (यूएस$79 मिलियन)


बाहुबली -2 



बाहुबली के मुरीद काफी दिनों से #WKKB हैशटैग के जरिए बाहुबली-2 को लेकर जोर-शोर से चर्चा कर रहे थे.
WKKB का अंग्रेजी में विस्तार है Why Katappa Killed Baahubali? हिंदी में ये बेहद लोकप्रिय सवाल है कि कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा? ये सवाल बाहुबली सीरीज की पहली फिल्म के आखिरी सीन से उठा था. बात दो साल पुरानी हो गई, मगर सवाल का जवाब नहीं मिला. अब चाहने वालों को उम्मीद थी कि बाहुबली-2 में इस सवाल का जवाब तो जरूर मिलेगा. लेकिन दर्शकों के सामने इस सवाल के साथ एक और सवाल खड़ा हो गया. #DRTOHS.
पहली फिल्म में आदिवासी युवक शिवुदू को पता चलता है कि वो तो महान अमरेंद्र बाहुबली का बेटा महेंद्र बाहुबली है. उसका महिषमति साम्राज्य का सिंहासन उसके निर्दयी चचेरे भाई बल्लभदेव और चाचा बिज्जलदेव ने छीन लिया था.
बाहुबली-2 में महेंद्र को अपना सिंहासन छीने जाने की कहानी पता चलती है. जिसके बाद वो अपने पिता और मुंहबोली दादी शिवागामी की मौत का बदला लेता है. साथ ही वो अपनी मां देवसेना को कैद से छुटकारा दिलाता है.पहली फिल्म की तरह ही बाहुबली-2 में काल्पनिक कहानी है. पौराणिक किरदार हैं और राजमहल की साजिशें हैं. इन्हें शानदार तस्वीरों की मदद से बड़े पर्दे पर और भी खूबसूरती से उतारा गया है..बाहुबली-1 के मुकाबले किस्सा-कहानी और पुराने पड़ चुके रीति-रिवाज की हिस्सेदारी कम हुई है. इसमें पारिवारिक साजिशों का हिस्सा बढ़ा है. स्पेशल इफेक्ट भी खूब डाले गए हैं.

राज से पर्दा उठ चुका है। कटप्पा ने बाहुबली को मारा, इस बहुप्रतिक्षित सवाल का जवाब देश को मिल चुका है। खैर मेरा मकसद ये नहीं है मैं आपको ये बताऊं कि कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा, वो सब बाद में।
बाहुबली के पहले भाग के साथ ही लोग दूसरे भाग का इंतजार करने लगे थे। दूसरे भाग बाहुबली: द कॉन्क्लूज़न को देखने के लिए लोगों की बेसब्री का तो ये हाल रहा कि कई सिनेमाघरों में टिकट का दाम 2000 तक पहुंच गया। शुरुआती कुछ दिनों के लिए सभी शो हाउसफुल हैं। कटप्पा ने राजमाता शिवागमी के कहने पर बाहुबली को मारा था। कटप्पा ने बाहुबली को मारने से मना किया तो राजमाता ने कहा कि वो खुद बाहुबली को मारेंगी। लेकिन कटप्पा ने बाहुबली को मारने का फैसला इसलिए लिया कि कहीं मां को सब गलत न समझने लगें। अमरेंद्र बाहुबली का बेटा महेंद्र बाहुबली वापस आता है और कटप्पा के साथ मिलकर भल्लालदेव को खत्म कर अपने पिता की साजिशन करवाई गई हत्या का बदला लेता है। ये तो रही फिल्म की स्टोरी।

मैं आप लोगों को ये बताना चाहता हूं कि बाहुबली 3 भी बन सकती है। ये मैं नहीं भाग दो की कहानी कह रही है। भले ही भाग 2 की तरह भाग 3 अपेक्षित न हों, लेकिन बाहुबली: द कॉन्क्लूज़न में कई घटनाएं और कहानियों का रुख अगले भाग की ओर इशारा कर रहे हैं। इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए अगर एस राजामौली बाहुबली 3 बनाने की घोषणा कर दें। क्यों बननी चाहिए भाग 3 या क्यों बन सकती है बाहुबली 3, इसके एक दो नहीं कुल 10 कारण हैं-

1- जिंदा हैं भल्लाल के पिता बिज्जलदेव

बाहुबली (प्रभास) को अपनी रणनीतियों से मरवाने वाला भल्लालदेव (राणा दुग्गुबाती) का पिता बिज्जलदेव (नस्सर) अभी भी जिंदा है। महेंद्र बाहुबली ने भल्लालदेव को तो मार दिया लेकिन बिज्ज्लदेव को छोड़ दिया। ऐसे में ये सवाल उठा रहा है कि बाहुबली के दोनों भागों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला ये शख्स अगर जिंदा है तो इसके पीछे कुछ तो कारण होगा ही।

2- कटप्पा को जिंदा रखने का कारण

पहले भाग की तरह इस भाग में भी कटप्पा (सत्यराज) की भूमिका सबसे महत्वपूण रही। या यों कहें कि कटप्पा का रोल सब पर भारी रहा। बूढ़े हो चुके कटप्पा को इस भाग में खत्म किया जा सकता था लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

3- महेंद्र बाहुबली और अवंतिका की शादी

महेन्द्र बाहुबली और अवंतिका (तमन्ना भाटिया) की शादी इस भाग में नहीं हुई। ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि अगले भाग में दोनों की शादी होगी और कहानी और आगे बढ़ेगी।

4- अवंतिका का रोल छोटा करना

पहले भाग में देवसेना (अनुष्का शेट्टी) का रोल कम था। इस भाग में अवंतिका की झलक मात्र दिखाई गई है। चूंकि देवसेना सख्त तेवर की हैं, तो ऐसे में अगले भाग में सास-बहू की कहानी को बिज्जलदेव अपने सकूनि चाल से आगे बढ़ा सकता है। बाहुबली 2 में महेंद्र भले ही अपनी मां देवसेना से मिल गया हो लेकिन प्रेमिका अवंतिका से उसका मिलन अभी अधूरा है। यानी बाहुबली 3 बनने का रास्ता पूरी तरह खुला है।

5- राजामौली ने भी बनाए रखा है सस्पेंस

बाहुबली 2 को लेकर हुए तमाम प्रमोशनल इवेंट्स में राजामौली के सामने ये सवाल आया कि क्या बाहुबली 3 बनेगी। इसको लेकर उन्होंने कुछ स्पष्ट नहीं कहा। वैसे उन्होंने यह बात कबूली कि पहले बाहुबली को लेकर वेब सीरीज बनाएंगे। ऐसे में राजामौली खुद भाग 3 कही ओर इशारा कर रहे हैं।

6- बाहुबली 2 का आखिरी सीन याद करिए

राजा बनने के बाद महेंद्र बाहुबली ने कहा कि मेरा वचन ही मेरा शासन है। उनके पिता को भी प्रजा राजा के रूप देखना चाहती थी लेकिन उनकी हत्या हो गई। ऐसे में महेंद्र बाहुबली अपने पिता और प्रजा के लिए शासक बन सकते हैं। अगले भाग में उनको कुशल शासक के रूप में पेश किया जा सकता है।

7- पिंडारियों का खत्म न होना

पिंडारियों पर पहले भी कई फिल्में बन चुकी हैं। वीर में सलमान खान पिंडार के रुप में दिखे थे। देवसेना की राज्य को बचाने के लिए बाहुबली ने कुछ पिंडारियों को मारा तो जरूर लेकिन उनका खात्मा नहीं हुआ। ऐसे में अगले भाग में पिंडारी महेंद्र बाहुबली से बदला ले सकते हैं। इसलिए भी अगला भाग बनाया जा सकता है।

8- शिवडु और संगा की कहानी

शिवडु और और उसकी मांग संगा की कहानी तो आपको याद ही होगी। बाहुबली के पहले भाग में जबतक बाहुबली पहाड़ के ऊपर नहीं जाते जबतक उनको अपनी सच्चाई नहीं पता चलती तब तक उनका नाम शिवडु था और उनकी मां का नाम संगा था। भाग दो में संगा के कैरेक्टर को साइलेंट रखा गया है। ऐसे में में उनकी भूमिका को जीवंत करने के लिए भाग तीन बनाई जा सकती है।

9- संन्यासी ने बताई शिव की मर्जी

फिल्म के एकदम आखिरी में एक बच्चा सवाल पूछता है कि माहिष्मती पर शासन किसने किया। क्या महेंद्र बाहुबली और उनके बच्चों का राज चला। इस पर बाहुबली वाले संन्यासी की आवाज में जवाब आता है- शिव की मर्जी मैं क्या जानूं। मतलब इसका जवाब अगले भाग में बताया जा सकता है।

10- हिट फिल्मों की सीरीज का चलन

जैसा की हम हॉलीवुड में देख चुके हैं। हिट फिल्मों की पूरी सीरीज चलती है। दोनों भाग के हिट होने के बाद अगले भाग का तुक इसलिए भी बढ़ सकता है।


केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री एम वेंकैया नायडू फिल्म बाहुबली की तारीफ करते नहीं थक रहे. बाॅक्स आॅफिस पर भारतीय फिल्म इतिहास के तमाम रिकाॅर्ड तोड़ने वाली एस एस राजमौली की फिल्म "बाहुबली 2: द कन्क्लूजन" को उन्होंने पीएम मोदी के मेक इन इंडिया अभियान का चमकता उदाहरण बताया है.विज्ञान भवन में 64 वें नेशनल फिल्म अवॉर्ड सेरेमनी के दौरान उन्होंने हाल में आई और भी फिल्मों की तारीफ की. लेकिन बाहुबली के लिए उनका खास प्रेम झलका. उन्होंने कहा कि- एक के बाद एक आ रही फिल्मों में हमें मेक इन इंडिया की झलक दिखती है. ये फिल्में न सिर्फ भारत में बल्कि पूरी दुनिया में इसे पसंद किया जा रहा है. चाहे वो दंगल हो, सुल्तान हो या न्यू रिलीज फिल्म बाहुबली. फिल्म बाहुबली भव्यता के मामले में एक पैमाना बन गई है. इसमें हमारे ही लोगों की तैयार की गई हमारे देश की प्रतिभा दिखती है. ये ‘मेक इन इंडिया’ का चमकता उदाहरण है. मैं डायरेक्टर को उनके स्किल और शानदार उपलब्धि के लिए बधाई देता हूं जिसपर हम सब को गर्व है.
नायडू ने कहा, 1913 में 'राजा हरिश्चंद्र' के बाद से, भारतीय सिनेमा में एक महान बदलाव आया है.सिनेमा की भाषा यूनिवर्सल है. भारतीय सिनेमा ने हमारी सांस्कृति, विविधता, एकता, भाषा और हमारे लैंडस्केप को दुनिया के सामने दिखाने में काफी योगदान दिया है.

हॉलीवुड वाली फीलिंग

इससे पहले भी नायडू ने एसएस राजामौली की तारीफ करते हुए कहा था कि फिल्म बाहुबली भारतीय सिनेमा को नई उंचाईयों तक ले गया है.केंद्रीय मंत्री ने कहा था, ‘इसमें शानदार विजुअल के प्रयोग हैं. जो हॉलीवुड की फिल्म ‘बेन हर’ और ‘टेन कमांडेंट्स’ जैसा एक्सपीरियंस देती है. मैं फिल्म के कैनवास, डायरेक्टर राजामौली के साहस, चरित्र, प्रोडक्शन क्वालिटी से आश्चर्यचकित हूं और इस तरह के ग्लोबल क्वालिटी फिल्म बनाने की प्रशंसा करता हूं.उन्होंने फिल्म देखने के बाद इसकी तुलना हॉलीवुड की फिल्म ‘द टेन कमांडेंट्स’ से की थी।

वास्तु 


  • वास्तु एक प्राचीन विज्ञान है, जो हमें बताता है कि घर, ऑफिस, व्यवसाय इत्यादि में कौन सी चीज होनी चाहिए और कौन सी नहीं. साथ हीं हमें यह भी बतलाता है कि किस चीज के लिए कौन सी दिशा सही होगी. यह हमें बताता है कि वास्तु दोषों का निवारण कैसे किया जा सकता है. यह मिथक या अन्धविश्वास पर आधारित बातें नहीं बताता है. कौन-सा कमरा किस दिशा में ज्यादा अच्छा रहेगा, कौन से पौधे आपको घर में लगाने चाहिए और कौन से नहीं इत्यादि. तो आइए जानते हैं कि वास्तुशास्त्र के अनुसार घर के लिए क्या-क्या सही है और क्या-क्या गलत।
 

  • घर के लिए कुछ महत्वपूर्ण वास्तु टिप्स :
  • पूजा घर उत्तर-पूर्व दिशा अर्थात ईशान कोण में बनाना सबसे अच्छा रहता है. अगर इस दिशा में पूजा घर बनाना सम्भव नहीं हो रहा हो, तो उत्तर दिशा में पूजा घर बनाया जा सकता है. लेकिन ध्यान रखें कि ईशान कोण सर्वश्रेष्ठ दिशा है.

  • पूजा घर से सटा हुआ या पूजा घर के ऊपर या नीचे शौचालय नहीं होना चाहिए.
  • पूजा घर में प्रतिमा स्थापित नहीं करनी चाहिए क्योंकि घर में प्राण प्रतिष्ठित मूर्ति का ध्यान उस तरह से नहीं रखा जा सकता है जैसा कि रखा जाना चाहिए. अतः छोटी मूर्तियाँ और चित्र हीं पूजा घर में लगाने चाहिए.
  • रसोई के लिए दक्षिण-पूर्व दिशा सबसे अच्छी होती है.सीढ़ी के नीचे पूजा घर नहीं बनाना चाहिए.

  • फटे हुए चित्र, या खंडित मूर्ति पूजा घर में बिल्कुल नहीं होनी चाहिए.

  • पूजा घर और रसोई या बेडरूम एक हीं कमरे में नहीं होना चाहिए.
  • घर के मालिक का कमरा दक्षिण-पश्चिम दिशा में होना चाहिए. अगर इस दिशा में सम्भव न हो, तो उत्तर-पश्चिम दिशा दूसरा सर्वश्रेष्ठ विकल्प है.
  • गेस्ट रूम उत्तर-पूर्व की ओर होना चाहिए. अगर उत्तर-पूर्व में कमरा बनाना सम्भव न हो, तो उत्तर पश्चिम दिशा दूसरा सर्वश्रेष्ठ विकल्प है.
  • उत्तर-पूर्व में किसी का भी बेडरूम नहीं होना चाहिए.
  • शौचालय और स्नानघर दक्षिण-पश्चिम दिशा में होना सर्वश्रेष्ठ है.
  • घर की सीढ़ी सामने की ओर से नहीं होनी चाहिए, और सीढ़ी ऐसी जगह पर होनी चाहिए कि घर में घूसने वाले व्यक्ति को यह सामने नजर नहीं आनी चाहिए.
  • सीढ़ी के पायदानों की संख्या विषम 21, 23, 25 इत्यादि होनी चाहिए.
  • सीढ़ी के नीचे शौचालय, रसोई, स्नानघर, पूजा घर इत्यादि नहीं होने चाहिए. सीढ़ी के नीचे कबाड़ भी नहीं रखना चाहिए.
  • सीढ़ी के नीचे कुछ उपयोगी सामान रख सकते हैं और सीढ़ी के नीचे रखे हुए सामान सुसज्जित होने चाहिए.
  • घर का कोई भी रैक खुला नहीं होना चाहिए. उसमें पल्ले जरुर लगाने चाहिए.
  • घर में कबाड़ नहीं रखना चाहिए.
  • कमरे की लाइट्स पूर्व या उत्तर दिशा में लगी होनी चाहिए.
  • घर के ज्यादातर कमरों की खिड़कियाँ और दरवाजे उत्तर या पूर्व दिशा में खुलने चाहिए.
  • सीढ़ी पश्चिम दिशा में होनी चाहिए.
  • घर का मुख्य दरवाजा दक्षिणमुखी नहीं होना चाहिए. अगर मजबूरी में दक्षिणमुखी दरवाजा बनाना पड़ गया हो, तो दरवाजे के सामने एक बड़ा सा आईना लगा दें.
  • घर के प्रवेश द्वार में ऊं या स्वस्तिक बनाएँ या उसकी थोड़ी बड़ी आकृति लगाएँ.
  • पूजा घर या उत्तर-पूर्व दिशा में जल से भरकर कलश रखें.
  • शयनकक्ष में भगवान की या धार्मिक आस्थाओं से जुड़ी तस्वीर नहीं लगानी चाहिए.
  • ताजमहल एक मकबरा है, इसलिए न तो इसकी तस्वीर घर में लगानी चाहिए. और न हीं इसका कोई शो पीस घर में रखना चाहिए.
  • जंगली जानवरों के फोटो घर में नहीं रखने चाहिए.
  • पानी के फुहारे को घर में नहीं लगाना चाहिए. क्योंकि इससे धन नहीं ठहरता है.
  • नटराज की तस्वीर या मूर्ति घर में नहीं रखनी चाहिए, क्योंकि इसमें शिवजी ने विकराल रूप लिया हुआ है.

उपासना पद्धति नहीं जीवन संस्कृति है धर्म


भारतीय चिंतन परम्परा और संस्कृति में धर्म शब्द का अर्थ बिलकुल स्पष्ट है। भारतीय शास्त्र जब अस्तित्व में आये तब धरती पर मज़हब या पंथ जैसे विषय नहीं थे। भारतीय मनीषियों ने धर्म को बड़े ही व्यवस्थित और सांस्कृतिक रूप से देखा और समझा है। हमारे चिंतन में धर्म का अर्थ सीधा मनुष्य के दायित्व से जुड़ा है। हमारी समस्त शास्त्रीय परम्पराये भी इसे इसी रूप में प्रतिपादित कराती है। वेदों से लेकर श्रुतियो , स्मृतियों , पुराणों और इतिहास तक में तक में धर्म का मतलब व्यक्ति के दायित्व से है। हमारी संस्कृति में बहुत ही स्पष्ट है। प्रत्येक व्यक्ति का उसकी उम्र , उसके पद ,उसकी रूचि ,उसके रिश्ते , उसके संबंधों के आधार पर उसके धर्म निर्धारित कर दिए गए है। उदाहरण के लिए एक ही व्यक्ति का एक पुत्र के रूप में अलग धर्म होता है , पिता के रूप में अलग धर्म होता है , पति केरूप में अलग धर्म है , भाई के रूप में अलग धर्म है , जेठ के रूप में अलग धर्म है , देवर के रूप अलग धर्म है , चाचा के रूप में अलग अलग धर्म है , दादा के रूप में अलग धर्म है , जीजा के रूप में अलग धर्म है , साले रूप में अलग धर्म है , स्वसुर के रूप में अलग धर्म है। यही स्थिति स्त्री के लिए भी है। हर पारिवारिक और सेनाजीक भूमिका में भी अलग अलग धर्म तय है। इसे कभी अलग से बताना नहीं पड़ता। इन सभी धर्मो के लिए इतनी सक्षम सांस्कृतिक व्यवस्था तय है की हर आदमी सम्बंधित भूमिका में आते ही उसका स्वयं निर्वाहन करने लगता है। इसी को भारतीय जीवन दर्शन भी कहा गया है। 


आज समाज में जिस प्रकार से धर्म शब्द का दुरूपयोग किया जा रहा है और गलत व्याख्या प्रस्तुत की जा रही है उसे देख कर क्षोभ होना स्वाभाविक है। इसमे हमारे तथाकथित बुद्धिजीवियों की बुद्धि पर भी तरस आती है। उन्हें यह तो विचार करना ही चाहिए की जब शास्त्रो में धर्म शब्द का उपयोग किया गया तब धरती पर पंथ या मज़हब या रिलिजन जैसे तत्त्व नहीं थे। इन तत्वो का विकास सभ्यता के विकास के दौर में उपजे संघर्षो के साथ हुआ है। भारत के शास्त्र किसी समुदाय विशेष के लिए नहीं लिखे गए। भारत के शास्त्रो में जो कुछ लिखा गया है वह मनुष्य के जीवन को सुसंस्कृत बनाने के लिए लिखा गया है। उसका किसी मज़हब , पंथ या रिलिजन से कोई नाता नहीं है। इसीलिए उसको सनातन की संज्ञा दी गयी है। भारतीय शास्त्र की समूची संवेदना संपूर्ण मानव समाज के लिए एक सामान है। उसमे कोई हिन्दू , मुसलमान , सिक्ख , ईसाई , यहूदी , पारसी या अरबी या अमेरिकन नहीं है। भारतीय शास्त्र हमेशा विश्व वन्धुत्व की बात करते है। भारत के शास्त्र शाश्वत मूल्यों की बात करते है जो धरती के हर मनुष्य पर सामान रूप से लागू होते है। हमारे शास्त्रो की समझ सनातन है। अनादि है। यहाँ कोई जाती , पंथ , मज़हब या सामुदायिक विभाजन नहीं है। यहाँ किसी प्रकार का मानव भेद नहीं है। 
भारतीय शास्त्रो में से केवल एक अत्याधुनिक शास्त्र श्रीमद्भागवतगीता को ही ले लीजिये। संपूर्ण गीता को ठीक से पढ़ डालिये। आपको कही कोई जाती या पंथ या समाज के विभाजन का कोई चिन्ह यहाँ नहीं मिलेगा। पूरी गीता केवल धर्म और अधर्म के दो पाटो के बीच उलझी हुई मानवता को अधर्म से मुक्ति का ही आख्यान है। यहाँ एक तरफ दायित्व , न्याय के पक्ष है और दूसरी तरफ वह पक्ष है जो अपने दायित्व से विमुख है। जब भी मनुष्य अपने दायित्व से विमुख होगा तो वह स्वतः ही अन्याय के रास्ते पर चलने लगेगा। गीता इसी अन्याय के विरुद्ध खड़ा होने का सन्देश है। जो अपने धर्म के आधार पर जीवन जीना चाहते है और अपने दायिव पोरे करने भर की व्यवस्था चाहते है जब उन्हें उनके इस कार्य में बढ़ा डाली जाती है और अधर्म अपना चुके लोग उन्हें समाज में अपमानित करने लगते है तब धर्म को अधर्म के विरूद्ध लड़ने के लावा कोई विकल्प शेष नहीं रह जाता। यह मानव इतिहास का ऐसा उदाहरण है जिसका कोई दूसरा प्रमाण अब तक नहीं मिला है। गीता शुरू होती है ध अक्षर से और ख़त्म होती है म अक्षर पर। भारतीय संस्कृति और चिंतन परम्परा के आचार्यो के मुताबिक़ इन्ही ध और म शब्दो के बीच जो रचना है उसी में आधा भाग उस विकृति का भी है जो अधर्म की ओर मनुष्य को ले जाती है। उसी आधार को काम करने के बाद जो आधा र बचता है वह जब ध और म के बीच व्यवस्थित होता है तब धर्म की स्थापना होती है। 
गीता का प्रथम श्लोक है -

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय ॥

गीता का आखिरी श्लोक है -
यत्र योगेश्वर: कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धर: ।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ।।



धर्मक्षेत्रे से शुरू होकर गीता नीतिर्मतिर्मम पर समाप्त होती है। ध से म तक की इसी यात्रा में भगवान श्री कृष्णा ने खुद के 574 श्लोको माध्यम से केवल धर्म को ही समझाया है। इन्ही प्रथम और अंतिम श्लोको में और भी बहुत सी बाते छिपी है। प्रथम श्लोक का धर्म और अंतिम श्लोक का मम मिल कर मम धर्म अर्थात स्वधर्म को परिभाषित करता है। यही प्रत्येक व्यक्ति का स्वधर्म है। यह प्रत्येक मनुष्य के लिए है। कृष्ण नीति का यही सार तत्त्व है। स्वधर्म को पूरी भारतीय संस्कृति अंगीकार करती है और सभी मनुष्यो से अंगीकार करने को कहती है। यही भारत की सांस्कृतिक विरासत भी है। और यह वह उदाहरण भी है जो विश्व को साफ़ साफ़ सन्देश देता है की जब भी धर्म पर अधर्म का अत्याचार बढ़ेगा , धार को उससे लड़ना ही पड़ेगा। जिस महाभारत के युध्दग गीत का एक बहुत ही छोटा सा अंश यह गीता है उस युद्ध के बाद केवल धर्म ही स्थापित हुआ। अधर्म को घनघोर पराजय मिली, यद्यपि हज़ारो ऐसे विद्वान् और आचार्य भी थे जिनसे भारत को बहुत कुछ सीखने को मिलता है पर वे चूँकि अधर्म के पक्ष में खड़े थे इस लिए उन्हें मरना ही पड़ा। यद्यपि वे बड़े ही चतुर , गुणी, ग्यानी , विद्वान् , निपुण , मर्मज्ञ , और श्रेष्ठ भी थे , फिर भी अधर्म के पक्ष में लडे और अधर्म का कलंक लेकर ही धरती से विदा हुए।
आज केवल भारत ही नहीं वरन दुनिया में धर्म शब्द का अतिशय दुरूपयोग किया जा रहा है। भारत में ही तथाकथित बुद्धिजीवी , विद्वान् , लेखक , मीडियाकर्मी , राजनीतिज्ञ , विचारक , चिंतक और खुद को सामाजिक कार्यकर्ता कहने वाले लोग जिस प्रकार से धर्म शब्द का दुरूपयोग कर भारतीयता को कालांकित करने का प्रयास कर रहे है वह दुर्भाग्यपूण है। उन्हें धर्म और मज़हब या पंथ का अंतर ही नहीं मालूम। खुद को अति स्टूडियस और स्कॉलर होने का दावा करने वाले इन लोगो को यह क्यों नहीं पता की जब वेद , उपनिषद् , पुराण , स्मृत्यो में धर्म शब्द लिखा जा रहा था तब धरती पर आदमी यानी मनुष्यता को खंड खंड बांटने वाले पंथो या मज़हबो का कोई अस्तित्व था ही नहीं। यह भी विडम्बना ही है की इन विन्दुओ को लेकर भारत के उस समाज में भी कोई हलचल नहीं होती जिन पर यह दारोमदार है कि वस्तुस्थिति की गलत व्याख्या हो तो वे उसे सुधारे। भारत के शिक्षालयों में भी एक से बढ़ कर एक गलत परम्पराये विक्सित की जा रही है। यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत के प्राचीन वांग्मय सरकारों और शिक्षाविदों के लिए साम्प्रदायिक लगते है। जो मनुष्यता के धर्म की शिक्षा के ग्रन्थ है वे साम्प्रदायिक सकते है। लेकिन यह तो दुर्भाग्य है की जो लोग देश के महज़ 70 सालो का शुद्ध इतिहास तक नहीं लिख पाए आज वे हमारी श्रुतियो , स्मृतियों , पुराणों और हमारे ही इतिहास को हमसे दूर करने में जुटे है।
यह गंभीर चिंता का विषय है की हमारे विश्वविद्यालयो में संस्कृति और सभ्यता की शिक्षा की आज तक कोई सटीक व्यवस्था नहीं हो सकी है। स्वाधीन भारत में शिक्षा को हमारी राजनीतिक व्यवस्था ने बहुत ही उपेक्षा के भाव से देखा है। अब तो केवल नौकरी देने वाली शिक्षा की वकालत ही की जा रही है। व्यवस्था ऐसी विक्सित की जा रही है की आने वाली पीढियां असली भारत को समझ ही न सके। पाठ्यक्रमो को तोड़मरोड़ कर ऐसा बनाया जा रहा है जिसमे किसी भी दशा में भारतीयता के तत्त्व बचने न पाए। न भाषा का शऊर देखा जा रहा है न ही व्याकरण की जगह बची है। विदेशी नक़ल में मशगूल कथित विद्वानों को भारत को पढने और समझने की भी जरूरत नहीं महसूस होती। यह सच में गंभीर चिंता की बात है की धर्म जैसे शब्द की गलत और अनर्गल व्याख्या पर भी कभी कोई स्वर देश में मुखर होता नहीं सुनाई पड़ता।
वस्तुस्थिति यह है की जो संस्कृति मानव का कल्याण करे वही धर्म है , जो मानव को विनष्ट करे वही अधर्म है।
धर्म और अधर्म की इतनी सामान्य और सटीक परिभाषा आज के बुद्धिजीवियों को समझ में आती। उन्हें यह क्यों नहीं समझ में आता की अधर्म का साथ देने के कारण भीष्म जैसे महा पुरुष को भी कृष्ण ने नहीं बख्शा। केवल अधर्म के साथी होने के कारण कर्ण , द्रोणाचार्य जैसो को अपमान भी सहन पड़ा और मारे भी गए। विद्वान लोग यदि गीता को ही ठीक से समझने की कोशिश करे तो बहुत सी बाते साफ़ हो जाती है। महाभारत का युद्ध किन्ही दो राष्ट्रों , दो राज्यो , या दो सभ्यताओ के बीच नहीं लड़ा गया। यह युद्ध केवल एक ही परिवार के दो मानसिकता वाले लोगो के बीच लड़ा गया। अब यह सोचने की बात है की केवल एक परिवार का आतंरिक युद्ध किस प्रकार से तत्कालीन सभ्यता और मानव इतिहास का सबसे भीषण युद्ध बन गया। आखिर कारण क्या था।एक ही परिवार के आंतरी मामले को लेकर इतना विशाल युद्ध कैसे संभव हो गया। व्याख्या में जाएंगे तो बहुत श्रम और समय लगेगा। इसे संक्षेप में इस रूप में ही समझ सकते है की यह सब केवल धर्म और अधर्म के बीच का ही संघर्ष था जिसमे उस काल की समस्त सभ्यताए शामिल हो गयी थी। धर्म और अधर्म का ऐसा बटवारा इतिहास में कही और न दीखता है ना ही पढने को ही मिलता है।

महाभारत काल के समस्त साहित्य और श्रुतियो के अध्ययन करने वाले विद्वानों का भी मत है की उस काल में प्रजा को अपने राजा से कोई शिकायत नहीं थी। कोई व्यक्ति नैतिक आधार पर राज्य की गद्दी पर विराजमान है या अनैतिक आधार से सत्ता के शिखर पर है , इससे प्रजा को कोई लेना देना नहीं था। प्रजा को जरूरत की हर चीजे मिल रही थी और वह संतुष्ट थी। ऐसा महाभारत कल भारत को समझने से लगता है की दुर्योधन जैसे राजा से भी प्रजा को कोई शिकायत नहीं थी। यानी समाज इतना व्यक्ति केंद्रित संस्कृति का शिकार था की उस काल में हर आदमी को केवल अपनी संतुष्टि और सुख से मतलब था। उस समय किसी को इस बात की चिंता नहीं थी की क्या हो रहा है , इसको भी जानने की कोशिश की जाय। व्यक्ति केंद्रित उस सभ्यता में अनैतिकता और अधर्म का ही चार्म था की जब द्रौपदी के शरीर से वस्त्र हटाने की घटना हुई तो समाज ने इसे केवल राजपरिवार का आपसी विवाद माना। इतनी बड़ी और वीभत्स घटना पर भी समाज में कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। जाहिर है की सभ्यता में यह अनैतिकता का ही चरम था। अब ऐसी सभ्यता और समाज भला क्या अपेक्षा की जा सकती थी। ऐसे समाज और सभ्यता को नष्ट होना ही चाहिए था और कृष्ण ने यही कार्य किया। उन्होंने उस पूरी अधर्म वाली सभ्यता को नष्ट करने के लिए ही अर्जुन को तैयार किया।
लगभग साढ़े पांच हज़ार साल बाद जब महाभारत के भीषण युद्ध के सोचते है तो और भी बहुत सी बाते सामने आती है। कृष्ण द्वारा उस पूरी सभ्यता को ख़त्म कर देने के बाद जिस भारत का निर्माण किया गया उस भारत में तीन हज़ार साल तक अधर्म के सम्मान पाने का कोई इतिहास नहीं मिलता। कृष्ण के तीन हज़ार साल बाद भारत की धरती पर बुद्ध और महावीर जैसे महापुरुषों का अभुदय इतिहास में मिलता है। उस काल में भी शब्द को लेकर कोई संशय नहीं दीखता है। बुध और महावीर के बाद सीधे चाणक्य आता है और तब हम की भारत की धरती पर अधर्म यानी अनैतिकता प्रचुर मात्रा में दिखनी शुरू जाती है। चाणक्य के दो सौ साल बाद शुरू होता है ईसा के अभुदय का काल और अस्तित्व में आती है क्रिश्चियनिटी। ईसा के 600 साल के बाद इस्लाम का जन्म होता है। इन दो समुदायों , नयो उपासना पद्धतियों के अस्तित्व के बाद से ही धर्म शब्द की अतार्किक और व्याख्याए होने लगी है। भारत के सनातन मानव धर्म को उपासना पद्धतियों का पर्याय बना कर प्रस्तुत किया जाने लगा और उसी क्रम को भारत के कथित बुद्धिजीवी भी आगे बढ़ा रहे है।
संजय तिवारी 
अध्यक्ष भारत संस्कृति न्यास , नयी दिल्ली

9450887186 

प्रोटोनिक वे ऑफ़ लाइफ

युग इलेक्टॉनिक युग है। हर और इलेक्ट्रॉनिक्स का दखल है। मनुष्य के जीवन का आधार ही इलेक्ट्रॉनिक वस्तुए बन गयी हैं। आदमी पूरी ताऊ पर इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओ पर आश्रित हो कर रह गया है। हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में इलेक्ट्रॉनिक्स से बहुत गहरे तक जुड़ा हुआ है। चाहे मोबाइल हो, टीवी हो , खाना बनाने के उपकरण हो , पानी गरम करने और ठंडा करने के उपकरण हो, दवाओ के माध्यम हो। कंप्यूटर हो , बिजली , पंखे, एसी या अन्य ऐसे अनेक सामान हैं जिनका उपयोग हर आदमी दिन भर कर रहा है। 


कहने का तात्पर्य यह है की आज की जीवन चर्या पूरी तौर पर इलेक्टॉनिक महल में चल रही है। हमारे चारो और केवल इलेक्ट्रॉन्स का ही बोलबाला है, फैलाव है,, विस्तार है। हम पूरी तौर पर २४ घंटे केवल इलेक्ट्रॉनिक महल में जी। इसी में सांस ले रहे हैं। ऐसे में हमारी सभी अन्तःस्रावी ग्रंथियों पर भी इलेक्ट्रॉन्स का गहरा असर पद रहा है। प्रचरता हमें कहा ले कर जा रही है इस पर कोई सोच नहीं रहा। इसके प्रभाव और इसकी गतिशीलता मनुष्य को किस रूप में कितना प्रभावित कर रही है इस पर सोचने समझने की हमें फुर्सत ही नहीं रह गयी है। 
इलेक्ट्रॉन्स को लेकर यह बात इसलिए लिखने की जरूरत महसूस हो रही है क्योकि इलेक्ट्रॉन्स की धर्मिता से आम आदमी बिलकुल परिचित नहीं है। जो जानकार है उनको मालूम है की जिन परमाणुओ से मिल कर हमारे शरीर की कोशिकाएं बानी हैं उन परमाणुओ के तीन प्रमुख बाग़ होते हैं। शरीर कोशिकाओ तक सीमित श्रिष्टि के प्रत्येक पदार्थ का गठन इन्ही परमाणुओ से हुआ है। इन परमाणुओ में एक धनात्मक अवयव होता है जिसे प्रोटोन कहा जाता है। एक अवयव होता है जो रीनात्मक होता है वह इलेक्ट्रान कहलाता है। एक तीसरा अवयव भी होता है जिसे न्यूट्रॉन कहते है। आज हमारी पूरी जीवन शैली में इलेक्ट्रान का प्रभुत्व है। यह इलेक्ट्रान केवल रीनात्मक होता है। इसमें केवल नेगेटिव गन ही होते हैं। आज इसी ऋणात्मक ऊर्जा में हम सभी सांस ले रहे हैं। हमारे हर और यही ऋणात्मक धारा प्रवाहित हो रही है। हम जितने भी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण इस्तेमाल करते हैं सभी में यही ऋणात्मक धारा बहती है। हर घर का हर आदमी आज इसी ऋणात्मक धरा से लिपट कर जीवन जी रहा है। अब आप खुद सोचिये की जहा केवल ऋणात्मक यानी नकारात्मक ऊर्जा ही सभी को सभी और से घेरे हुए है इस महल में किसी से आप ध्नत्मक… यानी पॉजिटिव एनर्जी , सोच की उम्मीद कैसे कर सकते हैं। इस नकारात्मक जीवन शैली में फिर नकारात्मक सोच और नकारात्मक विचारो की प्रधानता तो बढ़ेगी हि. इसको आप कैसे रोक सकते हैं। फिर इस इलेक्ट्रान की एक और विशिष्ट होती है की वह जहा अपने से ज्यादा ऋणात्मकता पाटा है उस और ही बढ़ कर मिल जाता है। अर्थात एक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण यदि हम प्रयोग कर रहे हैं तो उसका और भी व्यापक असर दूसरे उन उपकरणों के कारण है जिनका प्रयोग भले ही हम नहीं कर रहे लेकिन उनकी नकारात्मक ऊर्जा हमारे पास आ रही है।
मनुष्य के जीवन को इसी नकारात्मकता से बचाने और जीवन में सर्थक। धनात्मक गुणों के विकास के लिए भारत संस्कृति न्यास लगातार रहा है। शोध टीम ने इस नकारात्मकता से मनुष्य को मुक्ति दिलाने कई उपाय तलाशे हैं। इन्ही में एक उपाय है प्रोटोनिक वे ऑफ़ लाइफ का। प्रोटोनिक वे ऑफ़ लाइफ के माध्यम से भारत संस्कृति न्यास बहुत जल्दी ऐसे कार्यक्रम शुरू करने जा रहा है जहा से लोगो को पॉजिटिव एनर्जी के साथ , सकारात्मक सोच के साथ जीवन को जीने और आनंद से रहने की विधि बतायी जायेगी। भारत संस्कृति न्यास की प्रोटोनिक वे ऑफ़ लाइफ योजना में शामिल होकर आप अपने जीवन को सुखी और आनंदित बना सकेंगे, यह हमारा विशवास है।

संजय शांडिल्य
अध्यक्ष
भारत संस्कृति न्यास
नयी दिल्ली
९४५०८८७१८६

यूरेका : भारत का प्राचीनतम चोरिका बैंक 


संजय तिवारी 

दुनिया का संभवतः यह प्राचीनतम बैंक है। शायद सृष्टि के साथ ही शुरू हुआ होगा।  ऐसा बैंक जिसमे सोना ,चांदी  , हीरे मोती , जवाहरात , और रुपये , पैसे से लेकर दूध , दही , आचार , घी से लगायत वह हर वास्तु जमा होती रहती है जिसकी जरूरत कभी भी घर की इज्जत बचाने के लिए पड़ सकती है।  जो लोग गाँव से सम्बन्ध रखते होंगे उनको बड़की माई या ईया के लकड़ी वाले संदूक की याद जरूर होगी। जब कोई मेहमान घर में आता था तब इसी संदूक से खाने की विशिष्ट वस्तुओ के आलावा उसे उपहार में देने वाली वस्तुए भी निकला कराती थी।  



गाव में जब तक बड़े  संयुक्त सामूहिक परिवारों का अस्तित्व था तब तक इस बड़की माई  या ईया का भी अस्तित्व था और उनके संदूक रुपी चोरिका बैंक का भी। जब एकल परिवार बनने लगे तब चोरिका बैंक की कमान सीधे गृहिणी के हाथ आ गयी। इस बैंक की सबसे बड़ी विशेषता तो यह होता है कि घर का स्वामी जो भी सामग्री या धन गृहणी को देता है उसका बिलकुल सटीक हिसाब उसे तत्काल मिल जाता है फिर भी उसी में से बचाकर संचालित होने वाले चोरिका बैंक में बिना हिसाब के ही सम्बंधित राशि जमा  करती है। यह बैंक भारत के प्रायः सभी घरो में संचालित होता है जिसकी सीइओ हर पत्नी हुआ करती है। स्वनिर्मित बैंक की स्वनियुक्त सीईओ जब भी परिवार पर कोई आर्थिक संकट आता है तो स्वेक्षा से अनुदान या ऋण दे दिया करती है। कई बार इस ऋण पर  गृहस्वामी को भारी ब्याज भी देने की नौबत आती है और कई बार यह रकम न लौटाने वाले अनुदान के रूप में भी प्राप्त हो जाती है। 
कल जब से मोदी जी ने बड़े नोटों के बंद होने की घोषणा  की है , हर घर की चोरिका बैंक की सीईओ की नींद हराम हो गयी है। कारण यह की इस बैंक की साड़ी रकम 500 या हज़ार के नोटों के रूप में ही है। कई सीईओ ऐसी है जिनके पास का डिपाजिट बहुत भारी है। वित्त मंत्री अरुण जेटली को भी इस बैंक के बारे में पता रहा होगा तभी तो उन्होंने घोषणा कर दी की महिलाये परेशां न हो , ढाई लाख तक जमा करने पर उनसे कोई कुछ नहीं कहेगा। फिर भी देश में लाखो महिलाये परेशान है क्योकि उनके पास डिपाजिट बहुत ज्यादा है। 
उपासना पद्धति नहीं जीवन संस्कृति है धर्म

उपासना पद्धति नहीं जीवन संस्कृति है धर्म


संजय तिवारी
अध्यक्ष भारत संस्कृति न्यास , नयी दिल्ली

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भारतीय चिंतन परम्परा और संस्कृति में धर्म शब्द का अर्थ बिलकुल स्पष्ट है। भारतीय शास्त्र जब अस्तित्व में आये तब धरती पर मज़हब या पंथ जैसे विषय नहीं थे। भारतीय मनीषियों ने धर्म को बड़े ही व्यवस्थित और सांस्कृतिक रूप से देखा और समझा है। हमारे चिंतन में धर्म का अर्थ सीधा मनुष्य के दायित्व से जुड़ा है। हमारी समस्त शास्त्रीय परम्पराये भी इसे इसी रूप में प्रतिपादित कराती है। वेदों से लेकर श्रुतियो , स्मृतियों , पुराणों और इतिहास तक में तक में धर्म का मतलब व्यक्ति के दायित्व से है। हमारी संस्कृति में बहुत ही स्पष्ट है। प्रत्येक व्यक्ति का उसकी उम्र , उसके पद ,उसकी रूचि ,उसके रिश्ते , उसके संबंधों के आधार पर उसके धर्म निर्धारित कर दिए गए है। उदाहरण के लिए एक ही व्यक्ति का एक पुत्र के रूप में अलग धर्म होता है , पिता के रूप में अलग धर्म होता है , पति केरूप में अलग धर्म है , भाई के रूप में अलग धर्म है , जेठ के रूप में अलग धर्म है , देवर के रूप अलग धर्म है , चाचा के रूप में अलग अलग धर्म है , दादा के रूप में अलग धर्म है , जीजा के रूप में अलग धर्म है , साले रूप में अलग धर्म है , स्वसुर के रूप में अलग धर्म है। यही स्थिति स्त्री के लिए भी है। हर पारिवारिक और सेनाजीक भूमिका में भी अलग अलग धर्म तय है। इसे कभी अलग से बताना नहीं पड़ता। इन सभी धर्मो के लिए इतनी सक्षम सांस्कृतिक व्यवस्था तय है की हर आदमी सम्बंधित भूमिका में आते ही उसका स्वयं निर्वाहन करने लगता है। इसी को भारतीय जीवन दर्शन भी कहा गया है।
आज समाज में जिस प्रकार से धर्म शब्द का दुरूपयोग किया जा रहा है और गलत व्याख्या प्रस्तुत की जा रही है उसे देख कर क्षोभ होना स्वाभाविक है। इसमे हमारे तथाकथित बुद्धिजीवियों की बुद्धि पर भी तरस आती है। उन्हें यह तो विचार करना ही चाहिए की जब शास्त्रो में धर्म शब्द का उपयोग किया गया तब धरती पर पंथ या मज़हब या रिलिजन जैसे तत्त्व नहीं थे। इन तत्वो का विकास सभ्यता के विकास के दौर में उपजे संघर्षो के साथ हुआ है। भारत के शास्त्र किसी समुदाय विशेष के लिए नहीं लिखे गए। भारत के शास्त्रो में जो कुछ लिखा गया है वह मनुष्य के जीवन को सुसंस्कृत बनाने के लिए लिखा गया है। उसका किसी मज़हब , पंथ या रिलिजन से कोई नाता नहीं है। इसीलिए उसको सनातन की संज्ञा दी गयी है। भारतीय शास्त्र की समूची संवेदना संपूर्ण मानव समाज के लिए एक सामान है। उसमे कोई हिन्दू , मुसलमान , सिक्ख , ईसाई , यहूदी , पारसी या अरबी या अमेरिकन नहीं है। भारतीय शास्त्र हमेशा विश्व वन्धुत्व की बात करते है। भारत के शास्त्र शाश्वत मूल्यों की बात करते है जो धरती के हर मनुष्य पर सामान रूप से लागू होते है। हमारे शास्त्रो की समझ सनातन है। अनादि है। यहाँ कोई जाती , पंथ , मज़हब या सामुदायिक विभाजन नहीं है। यहाँ किसी प्रकार का मानव भेद नहीं है।


भारतीय शास्त्रो में से केवल एक अत्याधुनिक शास्त्र श्रीमद्भागवतगीता को ही ले लीजिये। संपूर्ण गीता को ठीक से पढ़ डालिये। आपको कही कोई जाती या पंथ या समाज के विभाजन का कोई चिन्ह यहाँ नहीं मिलेगा। पूरी गीता केवल धर्म और अधर्म के दो पाटो के बीच उलझी हुई मानवता को अधर्म से मुक्ति का ही आख्यान है। यहाँ एक तरफ दायित्व , न्याय के पक्ष है और दूसरी तरफ वह पक्ष है जो अपने दायित्व से विमुख है। जब भी मनुष्य अपने दायित्व से विमुख होगा तो वह स्वतः ही अन्याय के रास्ते पर चलने लगेगा। गीता इसी अन्याय के विरुद्ध खड़ा होने का सन्देश है। जो अपने धर्म के आधार पर जीवन जीना चाहते है और अपने दायिव पोरे करने भर की व्यवस्था चाहते है जब उन्हें उनके इस कार्य में बढ़ा डाली जाती है और अधर्म अपना चुके लोग उन्हें समाज में अपमानित करने लगते है तब धर्म को अधर्म के विरूद्ध लड़ने के लावा कोई विकल्प शेष नहीं रह जाता। यह मानव इतिहास का ऐसा उदाहरण है जिसका कोई दूसरा प्रमाण अब तक नहीं मिला है। गीता शुरू होती है ध अक्षर से और ख़त्म होती है म अक्षर पर। भारतीय संस्कृति और चिंतन परम्परा के आचार्यो के मुताबिक़ इन्ही ध और म शब्दो के बीच जो रचना है उसी में आधा भाग उस विकृति का भी है जो अधर्म की ओर मनुष्य को ले जाती है। उसी आधार को काम करने के बाद जो आधा र बचता है वह जब ध और म के बीच व्यवस्थित होता है तब धर्म की स्थापना होती है।
गीता का प्रथम श्लोक है -

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय ॥

गीता का आखिरी श्लोक है -

यत्र योगेश्वर: कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धर: ।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ।।

धर्मक्षेत्रे से शुरू होकर गीता नीतिर्मतिर्मम पर समाप्त होती है। ध से म तक की इसी यात्रा में भगवान श्री कृष्णा ने खुद के 574 श्लोको माध्यम से केवल धर्म को ही समझाया है। इन्ही प्रथम और अंतिम श्लोको में और भी बहुत सी बाते छिपी है। प्रथम श्लोक का धर्म और अंतिम श्लोक का मम मिल कर मम धर्म अर्थात स्वधर्म को परिभाषित करता है। यही प्रत्येक व्यक्ति का स्वधर्म है। यह प्रत्येक मनुष्य के लिए है। कृष्ण नीति का यही सार तत्त्व है। स्वधर्म को पूरी भारतीय संस्कृति अंगीकार करती है और सभी मनुष्यो से अंगीकार करने को कहती है। यही भारत की सांस्कृतिक विरासत भी है। और यह वह उदाहरण भी है जो विश्व को साफ़ साफ़ सन्देश देता है की जब भी धर्म पर अधर्म का अत्याचार बढ़ेगा , धार को उससे लड़ना ही पड़ेगा। जिस महाभारत के युध्दग गीत का एक बहुत ही छोटा सा अंश यह गीता है उस युद्ध के बाद केवल धर्म ही स्थापित हुआ। अधर्म को घनघोर पराजय मिली, यद्यपि हज़ारो ऐसे विद्वान् और आचार्य भी थे जिनसे भारत को बहुत कुछ सीखने को मिलता है पर वे चूँकि अधर्म के पक्ष में खड़े थे इस लिए उन्हें मरना ही पड़ा। यद्यपि वे बड़े ही चतुर , गुणी, ग्यानी , विद्वान् , निपुण , मर्मज्ञ , और श्रेष्ठ भी थे , फिर भी अधर्म के पक्ष में लडे और अधर्म का कलंक लेकर ही धरती से विदा हुए।

आज केवल भारत ही नहीं वरन दुनिया में धर्म शब्द का अतिशय दुरूपयोग किया जा रहा है। भारत में ही तथाकथित बुद्धिजीवी , विद्वान् , लेखक , मीडियाकर्मी , राजनीतिज्ञ , विचारक , चिंतक और खुद को सामाजिक कार्यकर्ता कहने वाले लोग जिस प्रकार से धर्म शब्द का दुरूपयोग कर भारतीयता को कालांकित करने का प्रयास कर रहे है वह दुर्भाग्यपूण है। उन्हें धर्म और मज़हब या पंथ का अंतर ही नहीं मालूम। खुद को अति स्टूडियस और स्कॉलर होने का दावा करने वाले इन लोगो को यह क्यों नहीं पता की जब वेद , उपनिषद् , पुराण , स्मृत्यो में धर्म शब्द लिखा जा रहा था तब धरती पर आदमी यानी मनुष्यता को खंड खंड बांटने वाले पंथो या मज़हबो का कोई अस्तित्व था ही नहीं। यह भी विडम्बना ही है की इन विन्दुओ को लेकर भारत के उस समाज में भी कोई हलचल नहीं होती जिन पर यह दारोमदार है कि वस्तुस्थिति की गलत व्याख्या हो तो वे उसे सुधारे। भारत के शिक्षालयों में भी एक से बढ़ कर एक गलत परम्पराये विक्सित की जा रही है। यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत के प्राचीन वांग्मय सरकारों और शिक्षाविदों के लिए साम्प्रदायिक लगते है। जो मनुष्यता के धर्म की शिक्षा के ग्रन्थ है वे साम्प्रदायिक सकते है। लेकिन यह तो दुर्भाग्य है की जो लोग देश के महज़ 70 सालो का शुद्ध इतिहास तक नहीं लिख पाए आज वे हमारी श्रुतियो , स्मृतियों , पुराणों और हमारे ही इतिहास को हमसे दूर करने में जुटे है।

यह गंभीर चिंता का विषय है की हमारे विश्वविद्यालयो में संस्कृति और सभ्यता की शिक्षा की आज तक कोई सटीक व्यवस्था नहीं हो सकी है। स्वाधीन भारत में शिक्षा को हमारी राजनीतिक व्यवस्था ने बहुत ही उपेक्षा के भाव से देखा है। अब तो केवल नौकरी देने वाली शिक्षा की वकालत ही की जा रही है। व्यवस्था ऐसी विक्सित की जा रही है की आने वाली पीढियां असली भारत को समझ ही न सके। पाठ्यक्रमो को तोड़मरोड़ कर ऐसा बनाया जा रहा है जिसमे किसी भी दशा में भारतीयता के तत्त्व बचने न पाए। न भाषा का शऊर देखा जा रहा है न ही व्याकरण की जगह बची है। विदेशी नक़ल में मशगूल कथित विद्वानों को भारत को पढने और समझने की भी जरूरत नहीं महसूस होती। यह सच में गंभीर चिंता की बात है की धर्म जैसे शब्द की गलत और अनर्गल व्याख्या पर भी कभी कोई स्वर देश में मुखर होता नहीं सुनाई पड़ता।

वस्तुस्थिति यह है की जो संस्कृति मानव का कल्याण करे वही धर्म है , जो मानव को विनष्ट करे वही अधर्म है।
धर्म और अधर्म की इतनी सामान्य और सटीक परिभाषा आज के बुद्धिजीवियों को समझ में आती। उन्हें यह क्यों नहीं समझ में आता की अधर्म का साथ देने के कारण भीष्म जैसे महा पुरुष को भी कृष्ण ने नहीं बख्शा। केवल अधर्म के साथी होने के कारण कर्ण , द्रोणाचार्य जैसो को अपमान भी सहन पड़ा और मारे भी गए। विद्वान लोग यदि गीता को ही ठीक से समझने की कोशिश करे तो बहुत सी बाते साफ़ हो जाती है। महाभारत का युद्ध किन्ही दो राष्ट्रों , दो राज्यो , या दो सभ्यताओ के बीच नहीं लड़ा गया। यह युद्ध केवल एक ही परिवार के दो मानसिकता वाले लोगो के बीच लड़ा गया। अब यह सोचने की बात है की केवल एक परिवार का आतंरिक युद्ध किस प्रकार से तत्कालीन सभ्यता और मानव इतिहास का सबसे भीषण युद्ध बन गया। आखिर कारण क्या था।एक ही परिवार के आंतरी मामले को लेकर इतना विशाल युद्ध कैसे संभव हो गया। व्याख्या में जाएंगे तो बहुत श्रम और समय लगेगा। इसे संक्षेप में इस रूप में ही समझ सकते है की यह सब केवल धर्म और अधर्म के बीच का ही संघर्ष था जिसमे उस काल की समस्त सभ्यताए शामिल हो गयी थी। धर्म और अधर्म का ऐसा बटवारा इतिहास में कही और न दीखता है ना ही पढने को ही मिलता है।

महाभारत काल के समस्त साहित्य और श्रुतियो के अध्ययन करने वाले विद्वानों का भी मत है की उस काल में प्रजा को अपने राजा से कोई शिकायत नहीं थी। कोई व्यक्ति नैतिक आधार पर राज्य की गद्दी पर विराजमान है या अनैतिक आधार से सत्ता के शिखर पर है , इससे प्रजा को कोई लेना देना नहीं था। प्रजा को जरूरत की हर चीजे मिल रही थी और वह संतुष्ट थी। ऐसा महाभारत कल भारत को समझने से लगता है की दुर्योधन जैसे राजा से भी प्रजा को कोई शिकायत नहीं थी। यानी समाज इतना व्यक्ति केंद्रित संस्कृति का शिकार था की उस काल में हर आदमी को केवल अपनी संतुष्टि और सुख से मतलब था। उस समय किसी को इस बात की चिंता नहीं थी की क्या हो रहा है , इसको भी जानने की कोशिश की जाय। व्यक्ति केंद्रित उस सभ्यता में अनैतिकता और अधर्म का ही चार्म था की जब द्रौपदी के शरीर से वस्त्र हटाने की घटना हुई तो समाज ने इसे केवल राजपरिवार का आपसी विवाद माना। इतनी बड़ी और वीभत्स घटना पर भी समाज में कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। जाहिर है की सभ्यता में यह अनैतिकता का ही चरम था। अब ऐसी सभ्यता और समाज भला क्या अपेक्षा की जा सकती थी। ऐसे समाज और सभ्यता को नष्ट होना ही चाहिए था और कृष्ण ने यही कार्य किया। उन्होंने उस पूरी अधर्म वाली सभ्यता को नष्ट करने के लिए ही अर्जुन को तैयार किया।


लगभग साढ़े पांच हज़ार साल बाद जब महाभारत के भीषण युद्ध के सोचते है तो और भी बहुत सी बाते सामने आती है। कृष्ण द्वारा उस पूरी सभ्यता को ख़त्म कर देने के बाद जिस भारत का निर्माण किया गया उस भारत में तीन हज़ार साल तक अधर्म के सम्मान पाने का कोई इतिहास नहीं मिलता। कृष्ण के तीन हज़ार साल बाद भारत की धरती पर बुद्ध और महावीर जैसे महापुरुषों का अभुदय इतिहास में मिलता है। उस काल में भी शब्द को लेकर कोई संशय नहीं दीखता है। बुध और महावीर के बाद सीधे चाणक्य आता है और तब हम की भारत की धरती पर अधर्म यानी अनैतिकता प्रचुर मात्रा में दिखनी शुरू जाती है। चाणक्य के दो सौ साल बाद शुरू होता है ईसा के अभुदय का काल और अस्तित्व में आती है क्रिश्चियनिटी। ईसा के 600 साल के बाद इस्लाम का जन्म होता है। इन दो समुदायों , नयो उपासना पद्धतियों के अस्तित्व के बाद से ही धर्म शब्द की अतार्किक और व्याख्याए होने लगी है। भारत के सनातन मानव धर्म को उपासना पद्धतियों का पर्याय बना कर प्रस्तुत किया जाने लगा और उसी क्रम को भारत के कथित बुद्धिजीवी भी आगे बढ़ा रहे है।