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चिकित्सा विज्ञान का जनक भारत



विश्व में चिकित्सा विज्ञान का जनक भारत ही है। यही भूमि है जहा लोगो के आरोग्य की व्यवस्था होती थी। भारतीय जीवन दर्शन में आरोग्य सबसे महत्वपूर्ण तत्व रहा है। व्यक्ति को नीरोग रखने के लिए बहुत से प्रबंध इस संस्कृति में किये गये है।  योग, प्राणायाम, व्यायाम आदि के आलावा बहुत से औषधीय एवं शाल्य व्यवस्थाएं भी हमारी प्राचीनतम संस्कृति और इसके क्रमिक विक्सित होती रही सभी सभ्यताओ में रहा है। भारत में मनुष्य को सूंदर, सडौल काय वाला तथा नीरोग रहने वाला ग्यानी प्राणी माना जाता रहा है। इसी आरोग्य को पाने के लिए आयुर्वेद की रचना की गयी और उसके अनुरूप ही जीवन जीने की व्यवस्था बनायी गयी।  




आयुर्वेद चिकित्सा दो प्रकार से की जाती थी-


 (अ) शोधन-पंचकर्म द्वारा

 ये निम्न हैं-
 (१) वमन- मुंह से उल्टी करके दोष दूर करना,
 (२) विरेचन-मुख्यत: गुदा मार्ग से दोष निकालना, 
(३) बस्ति (एनीमा) 
(४) रक्तमोक्षण-जहरीली चीज काटने पर या शरीर में खराब रक्त कहीं हो, तो उसे निकालना।
 (५) नस्य- नाक द्वारा स्निग्ध चीज देना 

(ब) शमन-

 औषधि द्वारा चिकित्सा
 इसकी परिधि बहुत व्याप्त थी। आठ प्रकार की चिकित्साएं बताई गई हैं। 
(१) काय चिकित्सा-सामान्य चिकित्सा 
(२) कौमार भृत्यम्‌-बालरोग चिकित्सा 
(३) भूत विद्या- मनोरोग चिकित्सा 
(४) शालाक्य तंत्र- उर्ध्वांग अर्थात्‌ नाक, कान, गला आदि की चिकित्सा 
(५) शल्य तंत्र-शल्य चिकित्सा 
(६) अगद तंत्र-विष चिकित्सा 
(७) रसायन-रसायन चिकित्सा 
(८) बाजीकरण

पुरुषत्व वर्धन औषधियां:

- चरक ने कहा, जो जहां रहता है, उसी के आसपास प्रकृति ने रोगों की औषधियां दे रखी हैं। अत: वे अपने आसपास के पौधों, वनस्पतियों का निरीक्षण व प्रयोग करने का आग्रह करते थे। एक समय विश्व के अनेक आचार्य एकत्रित हुए, विचार-विमर्श हुआ और उसकी फलश्रुति आगे चलकर ‘चरक संहिता‘ के रूप में सामने आई। इस संहिता में औषधि की दृष्टि से ३४१ वनस्पतिजन्य, १७७ प्राणिजन्य, ६४ खनिज द्रव्यों का उल्लेख है। 

इसी प्रकार सुश्रुत संहिता में ३८५ वनस्पतिजन्य, ५७ प्राणिजन्य तथा ६४ खनिज द्रव्यों से औषधीय प्रयोग व विधियों का वर्णन है। इनसे चूर्ण, आसव, काढ़ा, अवलेह आदि अनेक में रूपों औषधियां तैयार होती थीं। इससे पूर्वकाल में भी ग्रंथों में कुछ अद्भुत औषधियों का वर्णन मिलता है।

 जैसे बाल्मीकी रामायण में राम-रावण युद्ध के समय जब लक्ष्मण पर प्राणांतक आघात हुआ और वे मूर्छित हो गए, उस समय इलाज हेतु जामवन्त ने हनुमान जी के पास हिमालय में प्राप्त होने वाली चार दुर्लभ औषधियों का वर्णन किया।

 मृत संजीवनी चैव विशल्यकरणीमपि। सुवर्णकरणीं चैव सन्धानी च महौषधीम्‌॥ युद्धकाण्ड ७४-३३

 (१) विशल्यकरणी-शरीर में घुसे अस्त्र निकालने वाली 
(२) सन्धानी- घाव भरने वाली 
(३) सुवर्णकरणी-त्वचा का रंग ठीक रखने वाली 
(४) मृतसंजीवनी-पुनर्जीवन देने वाली 

चरक के बाद बौद्धकाल में नागार्जुन, वाग्भट्ट आदि अनेक लोगों के प्रयत्न से रस शास्त्र विकसित हुआ। इसमें पारे को शुद्ध कर उसका औषधीय उपयोग अत्यंत परिणामकारक रहा। इसके अतिरिक्त धातुओं, यथा-लौह, ताम्र, स्वर्ण, रजत, जस्त को विविध रसों में डालना और गरम करना-इस प्रक्रिया से उन्हें भस्म में परिवर्तित करने की विद्या विकसित हुई। यह भस्म और पादपजन्य औषधियां भी रोग निदान में काम आती हैं। 

शल्य चिकित्सा- भारत ही है सर्जरी का जन्मदाता  

कुछ वर्षों पूर्व इंग्लैण्ड के शल्य चिकित्सकों के विश्व प्रसिद्ध संगठन ने एक कैलेण्डर निकाला, उसमें विश्व के अब तक के श्रेष्ठ शल्य चिकित्सकों (सर्जन) के चित्र दिए गए थे। उसमें पहला चित्र आचार्य सुश्रुत का था तथा उन्हें विश्व का पहला शल्य चिकित्सक बताया गया था। वैसे भारतीय परम्परा में शल्य चिकित्सा का इतिहास बहुत प्राचीन है। भारतीय चिकित्सा के देवता धन्वंतरि को शल्य क्रिया का भी जनक माना जाता है। प्राचीनकाल में इस क्षेत्र में हमारे देश के चिकित्सकों ने अच्छी प्रगति की थी। अनेक ग्रंथ रचे गए। ऐसे ग्रंथों के रचनाकारों में सुश्रुत, पुष्कलावत, गोपरक्षित, भोज, विदेह, निमि, कंकायन, गार्ग्य, गालव, जीवक, पर्वतक, हिरण्याक्ष, कश्यप आदि के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं। इन रचनाकारों के अलावा अनेक प्राचीन ग्रंथों से इस क्षेत्र में भारतीयों की प्रगति का ज्ञान होता है। ऋग्वेद तथा अथर्ववेद में दिल, पेट तथा वृक्कों के विकारों का विवरण है। इसी तरह शरीर में नवद्वारों तथा दस छिद्रों का विवरण दिया गया है। वैदिक काल के शल्य चिकित्सक मस्तिष्क की शल्य क्रिया में निपुण थे।

 ऋग्वेद (८-८६-२) के अनुसार जब विमना और विश्वक ऋषि उद्भ्रान्त हो गए थे, तब शल्य क्रिया द्वारा उनका रोग दूर किया गया। इसी ग्रंथ में नार्षद ऋषि का भी विवरण है। जब वे पूर्ण रूप से बधिर हो गए तब अश्विनी कुमारों ने उपचार करके उनकी श्रवण शक्ति वापस लौटा दी थी। नेत्र जैसे कोमल अंग की चिकित्सा तत्कालीन चिकित्सक कुशलता से कर लेते थे। ऋग्वेद (१-११६-११) में शल्य क्रिया द्वारा वन्दन ऋषि की ज्योति वापस लाने का उल्लेख मिलता है। शल्य क्रिया के क्षेत्र में बौद्ध काल में भी तीव्र गति से प्रगति हुई। ‘विनय पिटक‘ के अनुसार राजगृह के एक श्रेष्ठी के सर में कीड़े पड़ गए थे। तब वैद्यराज जीवक ने शल्य क्रिया से न केवल वे कीड़े निकाले बल्कि इससे बने घावों को ठीक करने के लिए उन पर औषधि का लेप किया था। हमारे पुराणों में भी शल्य क्रिया के बारे में पर्याप्त जानकारी दी गई। ‘शिव पुराण‘ के अनुसार जब शिव जी ने दक्ष का सर काट दिया था तब अश्विनी कुमारों ने उनको नया सर लगाया था। इसी तरह गणेश जी का मस्तक कट जाने पर उनके धड़ पर हाथी का सर जोड़ा गया था। ‘रामायण‘ तथा ‘महाभारत‘ में भी ऐसे कुछ उदाहरण मिलते हैं। ‘रामायण‘ में एक स्थान पर कहा है कि ‘याजमाने स्वके नेत्रे उद्धृत्याविमना ददौ।‘ अर्थात्‌ आवश्यकता पड़ने पर एक मनुष्य की आंख निकालकर दूसरे को लगा दी जाती थी। (बा.रा.-२-१६-५) ‘महाभारत‘ के सभा पर्व में युधिष्ठिर व नारद के संवाद से शल्य चिकित्सा के ८ अंगों का परिचय मिलता है। वैद्य सबल सिंह भाटी कहते हैं कि सुश्रुत संहिता में शल्य चिकित्सा का प्रशिक्षण गुरुशिष्य परम्परा के माध्यम से दिया जाता था। मुर्दों तथा पुतलों का विच्छेदन करके व्यावहारिक ज्ञान दिया जाता था। प्रशिक्षित शल्यज्ञ विभिन्न उपकरणों तथा अग्नि के माध्यम से तमाम क्रियाएं सम्पन्न करते थे। जरूरत पड़ने पर रोगी को खून भी चढ़ाया जाता था। इसके लिए तेज धार वाले उपकरण शिरावेध का उपयोग होता था।

 आठ प्रकार की शल्य क्रियाएं- 

सुश्रुत द्वारा वर्णित शल्य क्रियाओं के नाम इस प्रकार हैं 

(१) छेद्य (छेदन हेतु) 
(२) भेद्य (भेदन हेतु) 
(३) लेख्य (अलग करने हेतु) 
(४) वेध्य (शरीर में हानिकारक द्रव्य निकालने के लिए) 
(५) ऐष्य (नाड़ी में घाव ढूंढने के लिए) 
(६) अहार्य (हानिकारक उत्पत्तियों को निकालने के लिए) 
(७) विश्रव्य (द्रव निकालने के लिए) 
(८) सीव्य (घाव सिलने के लिए)

 सुश्रुत संहिता में शस्त्र क्रियाओं के लिए आवश्यक यंत्रों (साधनों) तथा शस्त्रों (उपकरणों) का भी विस्तार से वर्णन किया गया है। आजकल की शल्य क्रिया में ‘फौरसेप्स‘ तथा ‘संदस‘ यंत्र फौरसेप्स तथा टोंग से मिलते-जुलते हैं। सुश्रुत के महान ग्रन्थ में २४ प्रकार के स्वास्तिकों, २ प्रकार के संदसों, २८ प्रकार की शलाकाओं तथा २० प्रकार की नाड़ियों (नलिका) का उल्लेख हुआ है। इनके अतिरिक्त शरीर के प्रत्येक अंग की शस्त्र-क्रिया के लिए बीस प्रकार के शस्त्रों (उपकरणों) का भी वर्णन किया गया है। पूर्व में जिन आठ प्रकार की शल्य क्रियाओं का संदर्भ आया है, वे विभिन्न साधनों व उपकरणों से की जाती थीं। 

उपकरणों (शस्त्रों) के नाम इस प्रकार हैं- अर्द्धआधार, अतिमुख, अरा, बदिशा, दंत शंकु, एषणी, कर-पत्र, कृतारिका, कुथारिका, कुश-पात्र, मण्डलाग्र, मुद्रिका, नख शस्त्र, शरारिमुख, सूचि, त्रिकुर्चकर, उत्पल पत्र, वृध-पत्र, वृहिमुख तथा वेतस-पत्र। 

आज से कम से कम तीन हजार वर्ष पूर्व सुश्रुत ने सर्वोत्कृष्ट इस्पात के उपकरण बनाये जाने की आवश्यकता बताई। आचार्य ने इस पर भी बल दिया है कि उपकरण तेज धार वाले हों तथा इतने पैने कि उनसे बाल को भी दो हिस्सों में काटा जा सके। शल्यक्रिया से पहले व बाद में वातावरण व उपकरणों की शुद्धता (रोग-प्रतिरोधी वातावरण) पर सुश्रुत ने इतना जोर दिया है तथा इसके लिए ऐसे साधनों का वर्णन किया है कि आज के शल्य चिकित्सक भी दंग रह जाएं। शल्य चिकित्सा (सर्जरी) से पहले रोगी को संज्ञा-शून्य करने (एनेस्थेशिया) की विधि व इसकी आवश्यकता भी बताई गई है। ‘भोज प्रबंध‘ (९२७ ईस्वी) में बताया गया है कि राजा भोज को कपाल की शल्य-क्रिया के पूर्व ‘सम्मोहिनी‘ नामक चूर्ण सुंघाकर अचेत किया गया था। 

चौदह प्रकार की पट्टियां- इन उपकरणों के साथ ही आवश्यकता पड़ने पर बांस, स्फटिक तथा कुछ विशेष प्रकार के प्रस्तर खण्डों का उपयोग भी शल्य क्रिया में किया जाता था। शल्य क्रिया के मर्मज्ञ महर्षि सुश्रुत ने १४ प्रकार की पट्टियों का विवरण किया है। उन्होंने हड्डियों के खिसकने के छह प्रकारों तथा अस्थि-भंग के १२ प्रकारों की विवेचना की है। यही नहीं, उनके ग्रंथ में कान संबंधी बीमारियों के २८ प्रकार तथा नेत्र-रोगों के २६ प्रकार बताए गए हैं। 

 कैंसर जैसा रोग नया नहीं है। सुश्रुत संहिता में मनुष्य की आंतों में कर्कट रोग (कैंसर) के कारण उत्पन्न हानिकर तन्तुओं (टिश्युओं) को शल्य क्रिया से हटा देने का विवरण है।

 शल्यक्रिया द्वारा शिशु-जन्म (सीजेरियन) की विधियों का वर्णन किया गया है। ‘न्यूरो-सर्जरी‘ अर्थात्‌ रोग-मुक्ति के लिए नाड़ियों पर शल्य-क्रिया का उल्लेख है तथा आधुनिक काल की सर्वाधिक पेचीदी क्रिया ‘प्लास्टिक सर्जरी‘ का सविस्तार वर्णन सुश्रुत के ग्रन्थ में है। आधुनिकतम विधियों का भी उल्लेख इसमें है। कई विधियां तो ऐसी भी हैं जिनके सम्बंध में आज का चिकित्सा शास्त्र भी अनभिज्ञ है। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि प्राचीन भारत में शल्य क्रिया अत्यंत उन्नत अवस्था में थी, जबकि शेष विश्व इस विद्या से बिल्कुल अनभिज्ञ था।

संजय तिवारी 
अध्यक्ष ,भारत संस्कृति न्यास 
9450887186 


मेले में हूँ अकेला और अकेले में हूँ मेला : मोरारी बापू 





राम किसी जाति  या धर्म के नहीं है।  राम सम्पूर्ण मानवता के है।  राम एक पात्र या व्यक्ति भर नहीं है।  राम प्रतीक है मानव समुदाय के नायकत्व के।  रामकथा किसी एक आदमी के जीवन की कहानी नहीं है।  राम कथा सृष्टि के संचालन की वह आदर्श समझाती है जिससे प्रत्येक प्राणी का अपना वजूद बनाता है। यह जीवन जीने की विधि है।  क़ानून है मानवता का।  मनुष्यता  जब भी भ्रमित या विचलित होती है यह कथा उसे पथ प्रदान कराती है।  राम कथा को स्थूल रूप में नहीं लेना चाहिए।  वैसे तो सामान्य जान को यह एक कहानी लगाती होगी पर मेरे लिए रामकथा समग्र सृष्टि  संचालन की व्यवस्था है। ये उदगार है विश्वप्रसिद्ध कथा वाचक और आधुनिक तुलसी के रूप में स्थापित मोरारी बापू के। बापू इन दिनों लखनऊ में रामकथा के सागर में लखनऊवासियों को डुबकी लगवा रहे है।  दरअसल मोरारी बापू रामकथा के सिलसिले से लखनऊ में 26 नवम्बर से अपना डेरा डाले  हुए है। नौ दिन की रामकथा में दुनिया को अमन प्रेम का सन्देश देने वाले मोरारी बापू का अंदाज़ बेहद जुदा है। रामकथा के दौरान शेरो शायरी और फिल्मो गाने का इस्तेमाल उनका शगल है लेकिन सादगी के साथ रहने के बाद भी उनकी सोच आधुनिक है , वह महिला अधिकारों के हिमायती है और हिन्दू मुस्लिम एकता के साथ सवर्ण और  दलितों के बीच की खाई को  मिटाना चाहते है।  प्रस्तुत है बापू से बातचीत के प्रमुख अंश -

बापू , आपका रामकथा के प्रति रुझान कैसे हुआ ?

विद्यार्थी  जीवन के दौरान मुझे घर से 5 मील दूर पढाई के लिए जाना पड़ता था। पांच मील के इसी रास्ते में दादाजी की बताई हुई रामायण की पांच चौपाइयां रोज़ याद करनीं पड़ती थी। इसी नियम की वजह से  साड़ी रामायण कंठस्थ हो गयी।  14 साल की उम्र में मैंने पहली बार एक महीने तक रामायण कथा का पाठ किया ,विद्यार्थी जीवन में मन अभ्यास में काम और रामकथा में ज़्यादा रमने लगा।पढाई पूरी करने के बाद  महुआ के उसी प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक बन गया जहाँ मैंने अपने बचपन में पढाई करता था। रामकथा में रमने के बाद अध्यापन कार्य छोड़ना पड़ा। महुआ से निकलने  के बाद 1966 में 9 दिन की रामकथा की शुरुआत नागबाई के पवित्र स्थल गांठिया से ऐसे हुई की अब तक बरक़रार है। 


आप बरसो से राम कथा करते आ रहे है , आपकी नज़र में रामकथा का सार क्या है ?

रामकथा के सार में मेरे पांच सबक है। पहला :जहां तक मुमकिन हो सच बोलना चाहिए लेकिन कटु नही। दूसरा : अहंकार से सावधान रहना चाहिए क्योंकि अंहकार बड़ी आसानी से लोगो में घर कर जाता है। तीसरा :हर इंसान को अपने धर्म ग्रन्थ को पढ़ना चाहिए और चिंतन मनन करना चाहिए। चौथा ;जहा तक हो सके , मौन धारण करना चाहिए इस मौन में ईश्वर का स्मरण करना चाहिए। पांचवा : शुभ का संग करना चाहिए। जितनी मात्रा में हो प्रेम का अनुसरण करते रहना चाहिए। 


युवा और बच्चे धर्म और अध्यात्म से ज़्यादा टेक्नोलॉजी से जुड़ चुके है क्या यही वजह है की धार्मिक आयोजनों में इनकी तादाद काम नज़र आती है ?

यह बात बिलकुल सही है की हर एक बच्चा टेक्नोलॉजी के युग में मोबाइल टीवी में मसरूफ है। बच्चे खेलना भूल गए,बारिश में भीगना भूल गए है ,चोट छोटी शरारते भूल गए है उनका बचपन गैजेट्स में खो गया है। इसके लिए ज़रूरत है की माता पिता बच्चो को समय दे ,समाज प्यार से समझाये तभी हमे इन बच्चो में कृष्ण मिल सकेंगे। मेरी कथा का केंद्र ही युवा है , हनुमान चालीस में भी लिखा है की  युवाओ को बल विद्या और बुद्धि मिले।  मैं एक प्राइमरी शिक्षक था मुझे पता है की कम नम्बरो से रुक रहे बच्चो को पासिंग मार्क्स दे दिए जाते है, मेरी कथाओ में 75 फीसदी युवा आते है इसलिए मैं पास हो गया। 


नोटबंदी पर आम जनता परेशान है क्या आप  नोटबंदी के फैसले पर केंद्र सरकार का समर्थन करते है ?

यह बात बिलकुल सही है की बैंक की लाइन में लगी आम जनता परेशान है ,गरीब किसान अपने ही पैसो के लिए परेशान है।  अभी परेशानी ज़रूर हो रही है लेकिन केंद्र सरकार के इस फैसले के दूरगामी परिणाम सामने आएंगे। लोगो को मुश्किल हो रही है इसके लिए सरकार ने अगर प्लानिंग के साथ कदम उठाया होता तो ज़्यादा अच्छा होता और आम जनता को इस तरह परेशान नही होना पड़ता।  कालेधन पर पूरी तरह अंकुश लगना चाहिए , काले धन का इस्तेमाल चाहे कर्म में हो या धर्म में सब पर रोक लगनी चाहिए। मेरा मानना है की आध्यात्मिक क्षेत्र में किया  जाने वाला खर्च काम होना चाहिए  मैंने अपने आयोजको को पहले ही चेतवानी दे दी है की जितनी ज़रूरत हो उतना ही पैसा खर्च हो फ़िज़ूलखर्ची की कोई ज़रूरत नही। 

बाबा राम देव योग गुरु है ,लेकिन उनके प्रोडक्ट्स की आये दिन हो रही लॉन्चिंग पर आपका क्या कहना है ?

रामदेव सही मायने में योग गुरु है ,पहले योग सिर्फ ग्रंथो और गुफाओ में था जिसको रामदेव ने बाहर निकाल कर योग को दुनिया में फैलाया है।योग में विद्या होनी चाहिए लेकिन प्रोडक्ट लांच करना अपना अपना फैसला है इस पर मैं  क्या बोल सकता हूँ। 


आप गोवध बंदी की बात करते है इस मुद्दे पर सरकार से कोई मांग करेंगे ?

 मेरा मानना है की गोवध पूरी तरह से ख़त्म होना चाहिए , सिर्फ गोवध ही नही सर्कार को शराब पर भी रोक लगानी चाहिए क्योंकि यह दोनों ही चीज़े समाज ख़ास कर देश के भविष्य को गलत रास्ते पर ले जा रही है। मुझे इस बात की खबर नही की सरकार गोवध बंदी पर क्या कदम उठा रही है। मैं भगवान् से कोई मांग नही करता तो इन राजनेताओ से क्या मांग करूँगा , मैं सिर्फ अपनी राय रखता हूँ। मैं किसी भी राजनेता या राजनैतिक दल से फासला बना कर चलता हूँ क्योंकि मेरा विषय अध्यात्म है राजनीती नही। 

केंद्र सरकार राममंदिर बनाने की बात करती है आपका क्या पक्ष है ? सीमा पर हो रहे तनाव पर आप क्या कहेंगे ?

राम किसी एक धर्म के नही बल्कि सभी धर्मो के हैं ,राममंदिर के लिए सबको साथ लेकर चलना होगा। सभी लोग राम के देश के लोग है सबका सम्मान करे। देश हित में दो धर्मो का संगम होना चाहिए लोग धर्मो से ऊपर उठते हुए प्रेम का अनुसरण करे , इस और काम भी किया जा रहा है लेकिन समाज को समझने की ज़रूरत है। धर्म सत्य है , प्रेम है ,करुणा है। मैं माला लेता हूँ खड़ाऊ पहनता हूँ यह मेरी अपनी निजी पसंद है यह धर्म नही है। धर्म को मोहब्बत और अमन का संदश देता है। सीमा पर तनाव हमारे वजह से नही है बल्कि पडोसी मुल्क पकिस्तान की वजह से।  भारत के जवान देश की रक्षा के लिए क़दम उठा रहे है इस बात की संतुष्टि है ज़रूरत है की देश के अंदर और सीमा पर अमन कायम हो।  हमारी( हिंदुस्तान )तरफ से हर बार कोशिश की जाती है लेकिन वो नही चाहते (बशीर बद्र का शेर पढ़ते हुए )फासले सदियो के एक लम्हे में मिट जाते दिल मिला लेते अगर हाथ मिलाने वाले। 

आपके शिष्य और अनुयायियों में कौन कौन है ?

(मुस्कुराते हुए अपने अंदाज़ में ) मेरा कोई शिष्य नही है न मैं किसी का गुरु हूँ।  मेरा कोई चेला नही सच्चाई यही है कि  मेले में मैं अकेला हूँ और अकेले में पूरा मेला हूँ। मैं शांति परम्परा का आदमी हूँ मेरा मक़सद सिर्फ अमन प्रेम शांति को मुल्क औरदुनिया भर में फैलाना है। 

जीवन में सबसे कठिन और लंबा रास्ता कौन सा है?

देखो , साधना का मार्ग कठिन और लंबा होता है। बिना विचलित हुए साधक इस मार्ग पर निरंतर चलता रहे तो निश्चित ही उसे परम सत्य का ज्ञान होता है। कठिन और लंबे रास्तों के बाद मिली सफलता स्थायी और आनंददायी होती है। आसान और शार्टकट वाली संस्कृति भ्रष्टाचार ला रही है। इंसान को अपने जीवन के लिए वो रास्ता अपनाना चाहिए, जिसके अंत में शांति, सुख और परमात्मा की प्राप्ति हो। जिन मार्गों पर ये नहीं मिलते, उन पर चलकर दुःख, अशांति और निराशा की प्राप्ति होती है। मानव को सत्याग्रह करने से पूर्व सत्याग्रही बनना चाहिए। सत्याग्रही बने बिना किया जाने वाला सत्याग्रह का कोई मोल नहीं है। मनुष्य को पहले स्वयं सत्य का साक्षात्कार करना चाहिए। जिस प्रकार एक आध्यात्मिक व्यक्ति की साधना सम्यक होती है, उसी प्रकार मनुष्य को भी चाहिए कि वो अपने जीवन में तथा क्रियाकलापों में एक सम्यता बनाए रखे। सम्यता का अर्थ है मध्य मार्ग।

बापू , इस आपाधापी के दौर में आदमी करे  क्या ?

जिस प्रकार वीणा के तार यदि कम कसे हों या ज्यादा कस दिए जाएं तो सुर नहीं निकलते। सुर निकालने के लिए अधिक और कम के मध्य की स्थिति श्रेष्ठ होती है, उसी प्रकार मनुष्य को भी जीवन में एक मध्य मार्ग अपनाकर चलना चाहिए। मनुष्य को परिवार में सभी सदस्यों का हाथ पकड़े रहना चाहिए लेकिन उनसे हाथ भर की दूरी भी बनाए रखे। इस प्रकार सांसारिक जीवन में एक प्रकार की प्रामाणिक दूरी बनाए रखे। भाव यह है कि इतना नजदीक न हो कि दूर जाते हुए डर लगे व इतना दूर न रहो कि पास आते हुए भय सताए। यही प्रमाणिकता है। किसी के बारे में शुभ कल्पना करो तो एक माह में सत्य हो जाती है। अपने बारे में की गई कल्पना को सत्य होने में कुछ ज्यादा समय लगता है। इसमें स्वार्थ आ जाता है, इसलिए इसमें साधक की क्षमतानुसार समय लगता है। सज्जनों एवं संतों के कथनों को परमात्मा स्वयं सत्य करता है।


रामकथा को लेकर आप लखनऊ आये है ,लेकिन इस बार आपकी रामकथा में शेरो शायरी में कमी क्यों नज़र आ रही है ?


रामकथा को लेकर लखनऊ आया हूँ ,मैं यहाँ जितनी बार आया हूँ मुझे यहाँ प्यार मिला है। लखनऊ में शालीनता है जो मुझे पसंद आती है।  जहाँ तक कथा में शेरो शायरी की बात है तो लखनऊ खुद शायरों की धरती है ,( हसँते हुए )मेरा लखनऊ  शेरो का इस्तेमाल करना ठीक नानी के आगे ननिहाल जैसा होगा। लखनऊ तो ग़ज़लों का शहर है।  शायरी की भूमि है। यह जायसी की भूमि है।  यहाँ से शायरी में रामकथा की धुन सुनाई पड़ती है।  प्रख्यात शायर बशीर बद्र साहब तो कूद कहते है कि मानस सुन सुन कर अपनी माँ से ही उन्होंने शायरी की शिक्षा पा ली।  अवध की धरती को भला मैं क्या सुना सकूंगा , जो भी उच्चारित होगा उसमे अवध ही होगा , यही अवध जो अवध्य है।

ब्रह्म मुहूर्त में उठने की परंपरा 


संजय तिवारी 

रात्रि के अंतिम प्रहर के तत्काबाद का समय को ब्रह्म मुहूर्त कहते हैं। हमारे ऋषि मुनियों ने इस मुहूर्त का विशेष महत्व बताया है। उनके अनुसार यह समय निद्रा त्याग के लिए सर्वोत्तम है। ब्रह्म मुहूर्त में उठने से सौंदर्य, बल, विद्या, बुद्धि और स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। सूर्योदय से चार घड़ी (लगभग डेढ़ घण्टे) पूर्व ब्रह्म मुहूर्त में ही जग जाना चाहिये। इस समय सोना शास्त्र निषिद्ध है। ब्रह्म  मुहूर्त यानी अनुकूल समय। रात्रि का अंतिम प्रहर अर्थात प्रात: 4 से 5.30 बजे का समय ब्रह्म मुहूर्त कहा गया है।

“ब्रह्ममुहूर्ते या निद्रा सा पुण्यक्षयकारिणी”।
(ब्रह्ममुहूर्त की निद्रा पुण्य का नाश करने वाली होती है।)

सिख मत में इस समय के लिए बेहद सुन्दर नाम है--*"अमृत वेला"* ईश्वर भक्ति के लिए यह महत्व स्वयं ही साबित हो जाता है। ईश्वर भक्ति के लिए यह सर्वश्रेष्ठ समय है। इस समय उठने से मनुष्य को सौंदर्य, लक्ष्मी, बुद्धि, स्वास्थ्य आदि की प्राप्ति होती है। उसका मन शांत और तन पवित्र होता है।



ब्रह्म मुहूर्त में उठना हमारे जीवन के लिए बहुत लाभकारी है। इससे हमारा शरीर स्वस्थ होता है और दिनभर स्फूर्ति बनी रहती है। स्वस्थ रहने और सफल होने का यह ऐसा फार्मूला है जिसमें खर्च कुछ नहीं होता। केवल आलस्य छोड़ने की जरूरत है।

पौराणिक महत्व -- वाल्मीकि रामायण  के अनुसार श्रीहनुमान ब्रह्ममुहूर्त में ही अशोक वाटिका पहुंचे। जहां उन्होंने वेद मंत्रो का पाठ करते माता सीता को सुना
शास्त्रों में भी इसका उल्लेख है--
वर्णं कीर्तिं मतिं लक्ष्मीं स्वास्थ्यमायुश्च विदन्ति।
ब्राह्मे मुहूर्ते संजाग्रच्छि वा पंकज यथा॥*
अर्थात- ब्रह्म मुहूर्त में उठने से व्यक्ति को सुंदरता, लक्ष्मी, बुद्धि, स्वास्थ्य, आयु आदि की प्राप्ति होती है। ऐसा करने से शरीर कमल की तरह सुंदर हो जाता हे।

ब्रह्म मुहूर्त और प्रकृति :--
ब्रह्म मुहूर्त और प्रकृति का गहरा नाता है। इस समय में पशु-पक्षी जाग जाते हैं। उनका मधुर कलरव शुरू हो जाता है। कमल का फूल भी खिल उठता है। मुर्गे बांग देने लगते हैं। एक तरह से प्रकृति भी ब्रह्म मुहूर्त में चैतन्य हो जाती है। यह प्रतीक है उठने, जागने का। प्रकृति हमें संदेश देती है ब्रह्म मुहूर्त में उठने के लिए।

इसलिए मिलती है सफलता व समृद्धि

आयुर्वेद के अनुसार ब्रह्म मुहूर्त में उठकर टहलने से शरीर में संजीवनी शक्ति का संचार होता है। यही कारण है कि इस समय बहने वाली वायु को अमृततुल्य कहा गया है। इसके अलावा यह समय अध्ययन के लिए भी सर्वोत्तम बताया गया है क्योंकि रात को आराम करने के बाद सुबह जब हम उठते हैं तो शरीर तथा मस्तिष्क में भी स्फूर्ति व ताजगी बनी रहती है

ब्रह्ममुहूर्त के धार्मिक, पौराणिक व व्यावहारिक पहलुओं और लाभ को जानकर हर रोज इस शुभ घड़ी में जागना शुरू करें तो बेहतर नतीजे मिलेंगे।

ब्रह्म मुहूर्त में उठने वाला व्यक्ति सफल, सुखी और समृद्ध होता है, क्यों? क्योंकि जल्दी उठने से दिनभर के कार्यों और योजनाओं को बनाने के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है। इसलिए न केवल जीवन सफल होता है। शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रहने वाला हर व्यक्ति सुखी और समृद्ध हो सकता है। कारण वह जो काम करता है उसमें उसकी प्रगति होती है। विद्यार्थी परीक्षा में सफल रहता है। जॉब (नौकरी) करने वाले से बॉस खुश रहता है। बिजनेसमैन अच्छी कमाई कर सकता है। बीमार आदमी की आय तो प्रभावित होती ही है, उल्टे खर्च बढऩे लगता है। सफलता उसी के कदम चूमती है जो समय का सदुपयोग करे और स्वस्थ रहे। अत: स्वस्थ और सफल रहना है तो ब्रह्म मुहूर्त में उठें।



वेदों में भी ब्रह्म मुहूर्त में उठने का महत्व और उससे होने वाले लाभ का उल्लेख किया गया है।*

प्रातारत्नं प्रातरिष्वा दधाति तं चिकित्वा प्रतिगृह्यनिधत्तो।
तेन प्रजां वर्धयमान आयू रायस्पोषेण सचेत सुवीर:॥ - ऋग्वेद-1/125/1
अर्थात- सुबह सूर्य उदय होने से पहले उठने वाले व्यक्ति का स्वास्थ्य अच्छा रहता है। इसीलिए बुद्धिमान लोग इस समय को व्यर्थ नहीं गंवाते। सुबह जल्दी उठने वाला व्यक्ति स्वस्थ, सुखी, ताकतवाला और दीर्घायु होता है।
यद्य सूर उदितोऽनागा मित्रोऽर्यमा। सुवाति सविता भग:॥ - सामवेद-35
अर्थात- व्यक्ति को सुबह सूर्योदय से पहले शौच व स्नान कर लेना चाहिए। इसके बाद भगवान की उपासना करना चाहिए। इस समय की शुद्ध व निर्मल हवा से स्वास्थ्य और संपत्ति की वृद्धि होती है।
उद्यन्त्सूर्यं इव सुप्तानां द्विषतां वर्च आददे।
अथर्ववेद- 7/16/२
अर्थात- सूरज उगने के बाद भी जो नहीं उठते या जागते उनका तेज खत्म हो जाता है।

व्यावहारिक महत्व - व्यावहारिक रूप से अच्छी सेहत, ताजगी और ऊर्जा पाने के लिए ब्रह्ममुहूर्त बेहतर समय है। क्योंकि रात की नींद के बाद पिछले दिन की शारीरिक और मानसिक थकान उतर जाने पर दिमाग शांत और स्थिर रहता है.

वास्तु 


  • वास्तु एक प्राचीन विज्ञान है, जो हमें बताता है कि घर, ऑफिस, व्यवसाय इत्यादि में कौन सी चीज होनी चाहिए और कौन सी नहीं. साथ हीं हमें यह भी बतलाता है कि किस चीज के लिए कौन सी दिशा सही होगी. यह हमें बताता है कि वास्तु दोषों का निवारण कैसे किया जा सकता है. यह मिथक या अन्धविश्वास पर आधारित बातें नहीं बताता है. कौन-सा कमरा किस दिशा में ज्यादा अच्छा रहेगा, कौन से पौधे आपको घर में लगाने चाहिए और कौन से नहीं इत्यादि. तो आइए जानते हैं कि वास्तुशास्त्र के अनुसार घर के लिए क्या-क्या सही है और क्या-क्या गलत।
 

  • घर के लिए कुछ महत्वपूर्ण वास्तु टिप्स :
  • पूजा घर उत्तर-पूर्व दिशा अर्थात ईशान कोण में बनाना सबसे अच्छा रहता है. अगर इस दिशा में पूजा घर बनाना सम्भव नहीं हो रहा हो, तो उत्तर दिशा में पूजा घर बनाया जा सकता है. लेकिन ध्यान रखें कि ईशान कोण सर्वश्रेष्ठ दिशा है.

  • पूजा घर से सटा हुआ या पूजा घर के ऊपर या नीचे शौचालय नहीं होना चाहिए.
  • पूजा घर में प्रतिमा स्थापित नहीं करनी चाहिए क्योंकि घर में प्राण प्रतिष्ठित मूर्ति का ध्यान उस तरह से नहीं रखा जा सकता है जैसा कि रखा जाना चाहिए. अतः छोटी मूर्तियाँ और चित्र हीं पूजा घर में लगाने चाहिए.
  • रसोई के लिए दक्षिण-पूर्व दिशा सबसे अच्छी होती है.सीढ़ी के नीचे पूजा घर नहीं बनाना चाहिए.

  • फटे हुए चित्र, या खंडित मूर्ति पूजा घर में बिल्कुल नहीं होनी चाहिए.

  • पूजा घर और रसोई या बेडरूम एक हीं कमरे में नहीं होना चाहिए.
  • घर के मालिक का कमरा दक्षिण-पश्चिम दिशा में होना चाहिए. अगर इस दिशा में सम्भव न हो, तो उत्तर-पश्चिम दिशा दूसरा सर्वश्रेष्ठ विकल्प है.
  • गेस्ट रूम उत्तर-पूर्व की ओर होना चाहिए. अगर उत्तर-पूर्व में कमरा बनाना सम्भव न हो, तो उत्तर पश्चिम दिशा दूसरा सर्वश्रेष्ठ विकल्प है.
  • उत्तर-पूर्व में किसी का भी बेडरूम नहीं होना चाहिए.
  • शौचालय और स्नानघर दक्षिण-पश्चिम दिशा में होना सर्वश्रेष्ठ है.
  • घर की सीढ़ी सामने की ओर से नहीं होनी चाहिए, और सीढ़ी ऐसी जगह पर होनी चाहिए कि घर में घूसने वाले व्यक्ति को यह सामने नजर नहीं आनी चाहिए.
  • सीढ़ी के पायदानों की संख्या विषम 21, 23, 25 इत्यादि होनी चाहिए.
  • सीढ़ी के नीचे शौचालय, रसोई, स्नानघर, पूजा घर इत्यादि नहीं होने चाहिए. सीढ़ी के नीचे कबाड़ भी नहीं रखना चाहिए.
  • सीढ़ी के नीचे कुछ उपयोगी सामान रख सकते हैं और सीढ़ी के नीचे रखे हुए सामान सुसज्जित होने चाहिए.
  • घर का कोई भी रैक खुला नहीं होना चाहिए. उसमें पल्ले जरुर लगाने चाहिए.
  • घर में कबाड़ नहीं रखना चाहिए.
  • कमरे की लाइट्स पूर्व या उत्तर दिशा में लगी होनी चाहिए.
  • घर के ज्यादातर कमरों की खिड़कियाँ और दरवाजे उत्तर या पूर्व दिशा में खुलने चाहिए.
  • सीढ़ी पश्चिम दिशा में होनी चाहिए.
  • घर का मुख्य दरवाजा दक्षिणमुखी नहीं होना चाहिए. अगर मजबूरी में दक्षिणमुखी दरवाजा बनाना पड़ गया हो, तो दरवाजे के सामने एक बड़ा सा आईना लगा दें.
  • घर के प्रवेश द्वार में ऊं या स्वस्तिक बनाएँ या उसकी थोड़ी बड़ी आकृति लगाएँ.
  • पूजा घर या उत्तर-पूर्व दिशा में जल से भरकर कलश रखें.
  • शयनकक्ष में भगवान की या धार्मिक आस्थाओं से जुड़ी तस्वीर नहीं लगानी चाहिए.
  • ताजमहल एक मकबरा है, इसलिए न तो इसकी तस्वीर घर में लगानी चाहिए. और न हीं इसका कोई शो पीस घर में रखना चाहिए.
  • जंगली जानवरों के फोटो घर में नहीं रखने चाहिए.
  • पानी के फुहारे को घर में नहीं लगाना चाहिए. क्योंकि इससे धन नहीं ठहरता है.
  • नटराज की तस्वीर या मूर्ति घर में नहीं रखनी चाहिए, क्योंकि इसमें शिवजी ने विकराल रूप लिया हुआ है.

अनुलोम-विलोम काव्य


राघवयादवीयम


संजय तिवारी

सृजन भारत की मौलिक पहचान है। सृजन ही यहाँ की संस्कृति है और इस सृजनात्मकता के कारण ही भारतीय आद्य साहित्य की अलौकिकता प्रमाणित होती है। भाषा , शब्द , वाक्य विन्यास , रस , छंद , अलंकार , समास , कारक , संधि , विभक्ति आदि व्याकरण के अंग है।  भाषिक संरचना और सम्प्रेषणीयता के लिए भाषा के व्याकरण का बहुत महत्त्व है। आज दुनिया में हर भाषा अपनी वैयाकरणीय व्यवस्था के कारण ही स्थापित अथवा विमुक्त होती है। भारत का महाभाग्य है कि यहाँ संस्कृत जैसी समृद्ध भाषा विद्यमान  रही है।  यद्यपि आज यह प्रचलन में बहुत कम हो गयी है लेकिन इसकी विरासत इतनी समृद्ध है जो इसे कभी विलुप्त नहीं होने देगी। इस संस्कृत की क्षमता ही है जिसमे ऐसे काव्य की रचना भी संभव है जिसे एक शैर से पढने पर एक अलग अर्थ हो और दूसरे शैर से पढने पर दूसरा अर्थ निकलता हो। यह भी केवल अर्थ तक ही सीमित नहीं है बल्कि एक सिरा रामकथा के आख्यान बताये और दूसरा सिरा कृष्ण कथा सुनाये , जब की काव्य केवल एक है। 
दुनिया की किसी भाषा में यह क्षमता नहीं है। भाषा की इस क्षमता को अनुलोम - विलोम काव्य कहा जाता है। संस्कृत भाषा में इसके उदाहरण मौजूद है। कांचीपुरम के 17वीं शदी के कवि वेंकटाध्वरि रचित ग्रन्थ "राघवयादवीयम्" ऐसा ही एक अद्भुत ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ को ‘अनुलोम-विलोम काव्य’ भी कहा जाता है। पूरे ग्रन्थ में केवल 30 श्लोक हैं। इन श्लोकों को सीधे-सीधे पढ़ते जाएँ, तो रामकथा बनती है और विपरीत (उल्टा) क्रम में पढ़ने पर कृष्णकथा। इस प्रकार हैं तो केवल 30 श्लोक, लेकिन कृष्णकथा के भी 30 श्लोक जोड़ लिए जाएँ तो बनते हैं 60 श्लोक। पुस्तक के नाम से भी यह प्रदर्शित होता है, राघव (राम) + यादव (कृष्ण) के चरित को बताने वाली गाथा है ~ "राघवयादवीयम।"



उदाहरण के तौर पर पुस्तक का पहला श्लोक हैः

वंदेऽहं देवं तं श्रीतं रन्तारं कालं भासा यः ।
रामो रामाधीराप्यागो लीलामारायोध्ये वासे ॥ १॥

अर्थातः
मैं उन भगवान श्रीराम के चरणों में प्रणाम करता हूं, जो
जिनके ह्रदय में सीताजी रहती है तथा जिन्होंने अपनी पत्नी सीता के लिए सहयाद्री की पहाड़ियों से होते हुए लंका जाकर रावण का वध किया तथा वनवास पूरा कर अयोध्या वापिस लौटे।

विलोमम्:

सेवाध्येयो रामालाली गोप्याराधी भारामोराः ।
यस्साभालंकारं तारं तं श्रीतं वन्देऽहं देवम् ॥ १॥

अर्थातः
मैं रूक्मिणी तथा गोपियों के पूज्य भगवान श्रीकृष्ण के
चरणों में प्रणाम करता हूं, जो सदा ही मां लक्ष्मी के साथ
विराजमान है तथा जिनकी शोभा समस्त जवाहरातों की शोभा हर लेती है।

" राघवयादवीयम" के ये 60 संस्कृत श्लोक इस प्रकार हैं:-

राघवयादवीयम् रामस्तोत्राणि
वंदेऽहं देवं तं श्रीतं रन्तारं कालं भासा यः ।
रामो रामाधीराप्यागो लीलामारायोध्ये वासे ॥ १॥

विलोमम्:
सेवाध्येयो रामालाली गोप्याराधी भारामोराः ।
यस्साभालंकारं तारं तं श्रीतं वन्देऽहं देवम् ॥ १॥

साकेताख्या ज्यायामासीद्याविप्रादीप्तार्याधारा ।
पूराजीतादेवाद्याविश्वासाग्र्यासावाशारावा ॥ २॥

विलोमम्:
वाराशावासाग्र्या साश्वाविद्यावादेताजीरापूः ।
राधार्यप्ता दीप्राविद्यासीमायाज्याख्याताकेसा ॥ २॥

कामभारस्स्थलसारश्रीसौधासौघनवापिका ।
सारसारवपीनासरागाकारसुभूरुभूः ॥ ३॥

विलोमम्:
भूरिभूसुरकागारासनापीवरसारसा ।
कापिवानघसौधासौ श्रीरसालस्थभामका ॥ ३॥

रामधामसमानेनमागोरोधनमासताम् ।
नामहामक्षररसं ताराभास्तु न वेद या ॥ ४॥

विलोमम्:
यादवेनस्तुभारातासंररक्षमहामनाः ।
तां समानधरोगोमाननेमासमधामराः ॥ ४॥

यन् गाधेयो योगी रागी वैताने सौम्ये सौख्येसौ ।
तं ख्यातं शीतं स्फीतं भीमानामाश्रीहाता त्रातम् ॥ ५॥

विलोमम्:
तं त्राताहाश्रीमानामाभीतं स्फीत्तं शीतं ख्यातं ।
सौख्ये सौम्येसौ नेता वै गीरागीयो योधेगायन् ॥ ५॥

मारमं सुकुमाराभं रसाजापनृताश्रितं ।
काविरामदलापागोसमावामतरानते ॥ ६॥

विलोमम्:
तेन रातमवामास गोपालादमराविका ।
तं श्रितानृपजासारंभ रामाकुसुमं रमा ॥ ६॥

रामनामा सदा खेदभावे दया-वानतापीनतेजारिपावनते ।
कादिमोदासहातास्वभासारसा-मेसुगोरेणुकागात्रजे भूरुमे ॥ ७॥

विलोमम्:
मेरुभूजेत्रगाकाणुरेगोसुमे-सारसा भास्वताहासदामोदिका ।
तेन वा पारिजातेन पीता नवायादवे भादखेदासमानामरा ॥ ७॥

सारसासमधाताक्षिभूम्नाधामसु सीतया ।
साध्वसाविहरेमेक्षेम्यरमासुरसारहा ॥ ८॥

विलोमम्:
हारसारसुमारम्यक्षेमेरेहविसाध्वसा ।
यातसीसुमधाम्नाभूक्षिताधामससारसा ॥ ८॥

सागसाभरतायेभमाभातामन्युमत्तया ।
सात्रमध्यमयातापेपोतायाधिगतारसा ॥ ९॥

विलोमम्:
सारतागधियातापोपेतायामध्यमत्रसा ।
यात्तमन्युमताभामा भयेतारभसागसा ॥ ९॥

तानवादपकोमाभारामेकाननदाससा ।
यालतावृद्धसेवाकाकैकेयीमहदाहह ॥ १०॥

विलोमम्:
हहदाहमयीकेकैकावासेद्ध्वृतालया ।
सासदाननकामेराभामाकोपदवानता ॥ १०॥

वरमानदसत्यासह्रीतपित्रादरादहो ।
भास्वरस्थिरधीरोपहारोरावनगाम्यसौ ॥ ११॥

विलोमम्:
सौम्यगानवरारोहापरोधीरस्स्थिरस्वभाः ।
होदरादत्रापितह्रीसत्यासदनमारवा ॥ ११॥

यानयानघधीतादा रसायास्तनयादवे ।
सागताहिवियाताह्रीसतापानकिलोनभा ॥ १२॥

विलोमम्:
भानलोकिनपातासह्रीतायाविहितागसा ।
वेदयानस्तयासारदाताधीघनयानया ॥ १२॥

रागिराधुतिगर्वादारदाहोमहसाहह ।
यानगातभरद्वाजमायासीदमगाहिनः ॥ १३॥

विलोमम्:
नोहिगामदसीयामाजद्वारभतगानया ।
हह साहमहोदारदार्वागतिधुरागिरा ॥ १३॥

यातुराजिदभाभारं द्यां वमारुतगन्धगम् ।
सोगमारपदं यक्षतुंगाभोनघयात्रया ॥ १४॥

विलोमम्:
यात्रयाघनभोगातुं क्षयदं परमागसः ।
गन्धगंतरुमावद्यं रंभाभादजिरा तु या ॥ १४॥

दण्डकां प्रदमोराजाल्याहतामयकारिहा ।
ससमानवतानेनोभोग्याभोनतदासन ॥ १५॥

विलोमम्:
नसदातनभोग्याभो नोनेतावनमास सः ।
हारिकायमताहल्याजारामोदप्रकाण्डदम् ॥ १५॥

सोरमारदनज्ञानोवेदेराकण्ठकुंभजम् ।
तं द्रुसारपटोनागानानादोषविराधहा ॥ १६॥

विलोमम्:
हाधराविषदोनानागानाटोपरसाद्रुतम् ।
जम्भकुण्ठकरादेवेनोज्ञानदरमारसः ॥ १६॥

सागमाकरपाताहाकंकेनावनतोहिसः ।
न समानर्दमारामालंकाराजस्वसा रतम् ॥ १७॥

विलोमम्:
तं रसास्वजराकालंमारामार्दनमासन ।
सहितोनवनाकेकं हातापारकमागसा ॥ १७॥

तां स गोरमदोश्रीदो विग्रामसदरोतत ।
वैरमासपलाहारा विनासा रविवंशके ॥ १८॥

विलोमम्:
केशवं विरसानाविराहालापसमारवैः ।
ततरोदसमग्राविदोश्रीदोमरगोसताम् ॥ १८॥

गोद्युगोमस्वमायोभूदश्रीगखरसेनया ।
सहसाहवधारोविकलोराजदरातिहा ॥ १९॥

विलोमम्:
हातिरादजरालोकविरोधावहसाहस ।
यानसेरखगश्रीद भूयोमास्वमगोद्युगः ॥ १९॥

हतपापचयेहेयो लंकेशोयमसारधीः ।
राजिराविरतेरापोहाहाहंग्रहमारघः ॥ २०॥

विलोमम्:
घोरमाहग्रहंहाहापोरातेरविराजिराः ।
धीरसामयशोकेलं यो हेये च पपात ह ॥ २०॥

ताटकेयलवादेनोहारीहारिगिरासमः ।

हासहायजनासीतानाप्तेनादमनाभुवि  ॥ २१॥

विलोमम्:
विभुनामदनाप्तेनातासीनाजयहासहा ।
ससरागिरिहारीहानोदेवालयकेटता ॥ २१॥

भारमाकुदशाकेनाशराधीकुहकेनहा ।
चारुधीवनपालोक्या वैदेहीमहिताहृता ॥ २२॥

विलोमम्:
ताहृताहिमहीदेव्यैक्यालोपानवधीरुचा ।
हानकेहकुधीराशानाकेशादकुमारभाः ॥ २२॥

हारितोयदभोरामावियोगेनघवायुजः ।
तंरुमामहितोपेतामोदोसारज्ञरामयः ॥ २३॥

विलोमम्:
योमराज्ञरसादोमोतापेतोहिममारुतम् ।
जोयुवाघनगेयोविमाराभोदयतोरिहा ॥ २३॥

भानुभानुतभावामासदामोदपरोहतं ।
तंहतामरसाभक्षोतिराताकृतवासविम् ॥ २४॥

विलोमम्:
विंसवातकृतारातिक्षोभासारमताहतं ।
तं हरोपदमोदासमावाभातनुभानुभाः ॥ २४॥

हंसजारुद्धबलजापरोदारसुभाजिनि ।
राजिरावणरक्षोरविघातायरमारयम् ॥ २५॥

विलोमम्:
यं रमारयताघाविरक्षोरणवराजिरा ।
निजभासुरदारोपजालबद्धरुजासहम् ॥ २५॥

सागरातिगमाभातिनाकेशोसुरमासहः ।
तंसमारुतजंगोप्ताभादासाद्यगतोगजम् ॥ २६॥

विलोमम्:
जंगतोगद्यसादाभाप्तागोजंतरुमासतं ।
हस्समारसुशोकेनातिभामागतिरागसा ॥ २६॥

वीरवानरसेनस्य त्राताभादवता हि सः ।
तोयधावरिगोयादस्ययतोनवसेतुना ॥ २७॥

विलोमम्
नातुसेवनतोयस्यदयागोरिवधायतः ।
सहितावदभातात्रास्यनसेरनवारवी ॥ २७॥

हारिसाहसलंकेनासुभेदीमहितोहिसः ।
चारुभूतनुजोरामोरमाराधयदार्तिहा ॥ २८॥

विलोमम्
हार्तिदायधरामारमोराजोनुतभूरुचा ।
सहितोहिमदीभेसुनाकेलंसहसारिहा ॥ २८॥

नालिकेरसुभाकारागारासौसुरसापिका ।
रावणारिक्षमेरापूराभेजे हि ननामुना ॥ २९॥

विलोमम्:
नामुनानहिजेभेरापूरामेक्षरिणावरा ।
कापिसारसुसौरागाराकाभासुरकेलिना ॥ २९॥

साग्र्यतामरसागारामक्षामाघनभारगौः 
निजदेपरजित्यास श्रीरामे सुगराजभा ॥ ३०॥

विलोमम्:
भाजरागसुमेराश्रीसत्याजिरपदेजनि ।स
गौरभानघमाक्षामरागासारमताग्र्यसा ॥ ३०॥

॥ इति श्रीवेङ्कटाध्वरि कृतं श्री  ।।

 यह अद्भुत रचना केवल भारत और भारतीय साहित्य में ही संभव है। दुनिया की कोई भाषा इस तरह की काय रचाना की क्षमता नहीं रखती। भारतीय भाषा विज्ञान के इस तत्व को समझने और वितरित करने की आवश्यकता इस लिए भी है क्योकि अब तो पश्चिम के आधुनिक  विज्ञान ने भी संस्कृत की शक्ति का लोहा मान लिया है। उपरोक्त श्लोको को गौर से अवलोकन करें कि दुनिया में कहीं भी ऐसा नही पाया गया ग्रंथ है ।